ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए जाने वाले ‘राय साहब’ के सम्मान को प्रेमचंद ने अस्वीकार कर दिया. शिवरानी देवी के साथ इस प्रसंग ने उनके नैतिक साहस, जनपक्षधरता और स्वतंत्र चेतना को और स्पष्ट किया. यह प्रसंग बताता है कि प्रेमचंद के लिए सत्ता का सम्मान नहीं, जनता का विश्वास और लेखक की आत्मा सबसे बड़ा मूल्य था.

