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मुंशी प्रेमचंद ने क्यों कहा था, ‘मुझे जनता की रायसाहबी पसंद है, सरकार की नहीं’

ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए जाने वाले 'राय साहब' के सम्मान को प्रेमचंद ने अस्वीकार कर दिया. शिवरानी देवी के साथ इस प्रसंग ने उनके नैतिक साहस, जनपक्षधरता और स्वतंत्र चेतना को और स्पष्ट किया. यह प्रसंग बताता है कि प्रेमचंद के लिए सत्ता का सम्मान नहीं, जनता का विश्वास और लेखक की आत्मा सबसे बड़ा मूल्य था.
Central Desk 1 August, 2026 1 minute read
प्रेमचंद की कहानी

“जनता के ‘राय साहब’: प्रेमचंद ने क्यों ठुकराया था ब्रिटिश सरकार का सम्मान?”

ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए जाने वाले ‘राय साहब’ के सम्मान को प्रेमचंद ने अस्वीकार कर दिया. शिवरानी देवी के साथ इस प्रसंग ने उनके नैतिक साहस, जनपक्षधरता और स्वतंत्र चेतना को और स्पष्ट किया. यह प्रसंग बताता है कि प्रेमचंद के लिए सत्ता का सम्मान नहीं, जनता का विश्वास और लेखक की आत्मा सबसे बड़ा मूल्य था.

प्रेमचंद जैसे महान लेखक के प्रसंग में मैंने एक बात पढ़ी है. ‘प्रेमचंद घर में’ किताब है, जिसे शिवरानी देवी जी ने लिखा है. शिवरानी देवी उनकी पत्नी थीं.

प्रेमचंद के पास ब्रिटिश हुकूमत में कलेक्टर के यहाँ से एक ख़त आया. उसमें लिखा था कि सरकार आपको ‘राय साहब’ के ख़िताब से नवाज़ना चाहती है. आपकी मंजूरी चाहिए.

प्रेमचंद ने वह चिट्ठी पढ़ी. अवाक रह गए. गर्दिश के दिन थे. मुसीबतें सिर पर थीं. परिवार अभाव झेल रहा था. ‘राय साहब’ का ख़िताब बहुत बड़ी चीज़ थी. ‘राय साहब’, ‘खान बहादुर’, ‘सर’, ये सब बड़ी उपाधियाँ थीं. इनके साथ सरकारी सुविधाएँ, प्रतिष्ठा और सम्मान भी मिलता था. बैठकों में आगे की ओर कुर्सी लगती थी और बड़े मनसबदारों में गिने जाते थे.

इसे ठुकराते हैं तो बड़ा नुकसान. लेते हैं तो और बड़ा नुकसान. करूँ तो क्या करूँ? मेरा मिजाज़ तो नहीं है कि मैं इसे ले सकूँ. लेकिन ‘ना’ लिखता हूँ तो सरकार को झेलना होगा. झेलेंगे.

उहापोह और उधेड़बुन में हफ्ते भर से दिन-रात काम छूट गया. रात को नींद नहीं आ रही थी. बेचैनी से भरे हुए थे. बिस्तर पर लेटते तो करवट बदलते, इधर-उधर होते, परेशान होकर उठ बैठते, टहलने लगते.

एक रात कई दिनों बाद शिवरानी देवी ने कहा, “क्या बात है? इधर तुम बहुत परेशान नज़र आते हो?”

उन्होंने कहा, “नहीं, कुछ नहीं.”

ऐसा कई बार कहकर उन्होंने बात टाल दी. अंत में प्रेमचंद के रुख को देखकर शिवरानी जी ने समझ लिया कि ज़रूर कोई बात है, जो छिपा रहे हैं. उन्होंने ज़िद की तो उन्हें बताना पड़ा.

लेटे हुए थे. प्रेमचंद ने कहा, “ऐसी-ऐसी बात है. सरकार कह रही है कि ‘राय साहब’ का ख़िताब देना चाहती है. मैं सोच नहीं पा रहा हूँ कि क्या कहूँ, क्या जवाब दूँ?”

शिवरानी देवी ने कहा, “बस, इसके लिए तुम परेशान हो?”

“अरे, तो क्या करूँ? तुमको क्या लगता है?”

उन्होंने कहा, “अरे, लिख दो ना. मुझे जनता की रायसाहबी पसंद है, सरकार की नहीं.”

प्रेमचंद बिस्तर पर उठ बैठे. उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं. मुश्किलों से भरी ज़िंदगी में उनकी मालकिन कह रही हैं कि इसकी क्या ज़रूरत है. जितना त्याग करने के लिए वह तैयार थे, उससे बहुत आगे जाकर उनकी पत्नी कह रही हैं कि हम इसे नामंजूर करते हैं. तुम जनता के राय साहब हो.

प्रेमचंद ने फौरन तहरीर लिख भेजी. “मुझे राय साहब का ख़िताब नहीं चाहिए. मुझे जनता की रायसाहबी पसंद है, सरकार की नहीं.”

यह खरा-सा जवाब प्रेमचंद का ब्रिटिश हुकूमत के पास गया. ये थे प्रेमचंद, जो पुरस्कार को ठोकर मार सकते थे. बड़े ओहदे को ठोकर मार सकते थे.

पहले भी उन्होंने इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स की नौकरी से इस्तीफ़ा दिया था. गांधी जी के आह्वान पर स्वदेशी आंदोलन और आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए. वह प्रेमचंद थे, जिनके अंदर छटपटाहट और मुक्ति का संघर्ष लगातार उन्हें बेचैन करता था. वही सब वह लिख रहे थे. यही उनका साहित्य है, जो एक दिन सरकार को उसे जब्त करने के लिए मजबूर कर देता है.

बहुत कम ऐसा लिखा गया होगा, जिसे सरकार को जब्त करने की ज़रूरत महसूस हुई. नौकरी छोड़ने के बाद, और अंत में ‘राय साहब’ का ख़िताब ठुकराने के बाद, जिस तरह से वे जनता के लेखक बनकर उभरे, जनता को जो संबल मिला, वह नवजागरण का समय भी था. सुधार का समय भी था.

आरंभ में इसलिए वे आदर्शवादी लेखन कर रहे थे. बाद में उन्होंने यथार्थ का लेखन शुरू किया. पहले हृदय परिवर्तन का लेखन कर रहे थे. फिर उन्होंने हक़ीक़त बयान करना शुरू किया. दोनों बहुत दूर नहीं थे. उनका आदर्श खोखला आदर्श नहीं था. उनका आदर्श बहुत व्यावहारिक था. लेकिन सिर्फ़ आदर्श से काम चलने वाला नहीं था. उस आदर्श से आगे जाकर हृदय परिवर्तन एक बहुत बड़ी कोशिश थी, जो उनके ऊपर गांधी के सानिध्य में आने से, गांधी के विचारों के संपर्क में आने से हुई होगी.

यह हृदय परिवर्तन, जो हम बुद्ध के दर्शन और उनके जीवन में देखते हैं. उनके पास आने वाले व्यक्ति का, कठोर से कठोर और निष्ठुर से निष्ठुर व्यक्ति का हृदय बदल जाता था. प्रेमचंद के आरंभिक साहित्य में भी हमें इस तरह का हृदय परिवर्तन दिखाई देता है.

उनकी कहानी जेवर का डिब्बा, अलग्योझा, ऐसी बहुत-सी कहानियाँ हैं. मुझे पढ़े हुए अरसा हो गया. आप देखें तो उनमें अंत में लोग समझौते की स्थिति में आ जाते हैं, गले मिलते हैं. पंच परमेश्वर में जुम्मन शेख की कहानी भी ऐसी ही है. वह न्याय की बात करती है. सब कुछ सही है. लेकिन वह एक आदर्श है.

उनका आदर्श, जैसा मैंने कहा, व्यवहार का है. “बिगाड़ के डर से ईमान की बात न करोगे”, इस तरह की बात करते हैं. इसलिए प्रेमचंद हमारे लिए बहुत मायने रखते हैं.

वे सांप्रदायिकता के विरुद्ध, अंधविश्वास, जातिवाद, ऊँच-नीच और भेदभाव के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं. यहाँ तक कि अपने जीवन के बाद के दिनों में वे ‘हतभागे किसान’ और महाजनी सभ्यता जैसी रचनाएँ लिखते हैं.

उन्होंने भारत में बोल्शेविक आंदोलन का प्रभाव देखा. किसान आंदोलन का असर भी देख रहे थे. भारत में उस समय किसान आंदोलन भी था. सत्याग्रह राजनीतिक कारणों से हो रहा था और किसानों का आंदोलन भी राजनीतिक कारणों से ही हो रहा था. इसमें महापंडित राहुल सांकृत्यायन और बाद में स्वामी सहजानंद आदि जैसे लोग सामने आते हैं. उसकी शुरुआत पहले से हो चुकी थी. रह-रहकर देश में आंदोलन अलग-अलग रूपों में, अलग-अलग परिस्थितियों में चलते रहे और उन सब पर प्रेमचंद की नज़र रही.

उन्होंने राजनीति को बखूबी समझा था. राजनीति के रूप को, राजनीति के इरादे को, चाहे वह विदेशी शासकों के हाथ में हो या अपने देश के लोगों के हाथ में. सरकार का चरित्र क्या है. वह किस तरह से हमारे लिए चुनौती बनता है. आने वाले वक्त में उसका क्या स्वरूप होगा. भविष्य का सपना क्या है. आज़ादी की यह लड़ाई सही मायनों में किस दिशा में जानी चाहिए. हमें कहाँ पहुँचना है. इतिहास की दिशा किधर है. इन सबका आकलन प्रेमचंद करते हैं. वे भविष्य के एक सपने के साथ आने वाले समय का आकलन करते हैं और अपने लेखन में उसे अभिव्यक्ति देते हैं.

डॉ. संजय श्रीवास्तव (डॉ. संजय श्रीवास्तव भाषा विज्ञान के प्रोफेसर और ‘वर्तमान साहित्य’ के संपादक हैं.)

Tags: मुंशी प्रेमचंद साहित्य साहित्यकार

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