रसड़ा एक प्रमुख स्थान है. यहा नाथ संप्रदाय का प्रभाव है, जिसके कारण यहां नाथ बाबा का मंदिर बना हुआ है जहां नवरात्रि में मेला लगता है.
रसड़ा एक प्रमुख स्थान है. यहा नाथ संप्रदाय का प्रभाव है, जिसके कारण यहां नाथ बाबा का मंदिर बना हुआ है जहां नवरात्रि में मेला लगता है.
जब मन में श्रद्धा का भाव होगा तो कन्या सभी जगह सुरक्षित रहेगी.उन्होंने इस अवसर पर उपस्थित लोगों आशीर्वचन दिया.
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मां के दरबार में आने वाला हर कोई झोली भर कर ले गया
देवी से जुड़ी है कई पौराणिक कथाएं
इस अवसर पर ब्राह्मण स्वयंसेवक संघ के जिला प्रभारी पंकज कुमार मिश्र ने माता के पट का अनावरण करते हुए उपस्थित भक्त जनों को नवरात्र की बधाई दी
रसड़ा के शिवनगर उत्तर पट्टी में 15 वर्षों से बनाई जा रही है. मां की प्रतिमा पूरे जिले के लिए ऐसे ही खास नहीं होती. दरअसल इस मूर्ति को बनाने के लिए कारीगर अपनी पूरी कला का प्रदर्शन करते हैं. तब जाकर कहीं न कहीं यहां की मूर्ति पूरे जिले के लिए खास होती है.
बांसडीह, बलिया. शारदीय नवरात्रि का समय चल रहा है. अष्टमी नवमी को मेला भी लगेगा. वैसे दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल का प्रसिद्ध माना जाता है लेकिन देवरार गांव स्थित दुर्गा मंदिर पर शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन शनिवार को अलग नजारा दिखाई दिया जहां एकत्रित होकर महिलाएं, दो पुरुष एक साथ भोजपुरी में देवी गीत सुना रहे थे. ऐसे में दो देवी भक्त महिलाएं नाचने पर मजबूर हो गई.
भगवती की बात को सुनकर राक्षस राजी हो गया और शाम होते ही नाला खोदना शुरू कर दिया. अभी वह सोनाडीह से कुछ दूरी पहले तक ही नाला खोद पाया था कि सूर्योदय हो गया.
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दोनों मंदिर भक्तों की अभीष्ट सिद्ध कर रहे हैं. मान्यता है कि यहां की प्रतिमा सुबह से शाम तक तीन बार अपना रूप बदलती है.
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श्रीभगवान राय कहते हैं कि मां जल्पा के दर्शन के लिए जिले ही नहीं आसपास के जिलों के लोग आते हैं. मन्नतें पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ाने का रिवाज है.
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मां की उचेडा में अवतरित होने की कहानी
कालान्तर में लगभग 150 वर्ष पूर्व मंदिर के समीपस्थ गोपालपुर गांव के एक ब्राम्हण विंध्याचल स्थित मां विंध्यवासिनी का दर्शन करने के लिये पैदल ही जाया करते थे.
किंवदंती है कि 1876 से पहले वाली जब यह स्थान गाजीपुर जिला में हुआ करता था, उस समय कोरंटाडीह को तहसील बनाया गया था. तहसील के निर्माण कार्य में यह मंदिर बाधक बन रहा था.
माता रानी के आशीर्वाद से यश प्राप्त करने वाले भक्तों ने धीरे धीरे मंदिर को भव्य बनाना शुरू किया. आज मातारानी का मंदिर पूरी भव्यता से एन एच से सटे कपुरी गांव की शोभा बढ़ा रहा है.