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पत्रकारिता दिवस पर खास रिपोर्ट: दूध नहीं छाछ फूंक कर पीने वाली हो गई है पत्रकारिता

पत्रकारिता दूध फूंककर पीने की नहीं बल्कि छाछ फूंक कर पीने की चीज हो गई है. आज इस विधा से जुड़े लोगों को पत्रकारिता दिवस पर आत्म चिंतन करने की जरूरत है कि पत्रकारिता बेबाक रहेगी या सत्ता की गुलाम बन कर रह जाएगी. अगर बेबाक रही तो समाज राष्ट्र निर्माण के काम आएगी अगर सत्ता की कठपुतली बनी तो देश और समाज में विघटन पैदा करने का काम करेगी.
Central Desk 29 May, 2022 1 minute read

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journalist

–मिशन , प्रोफेशन से प्रोडक्शन तक की पत्रकारिता का दौर

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का आगाज 30 मई 1826 को हुआ था. इसी के चलते 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाते है. इसी दिन कानपुर के पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने भारत में हिंदी पत्रकारिता की आवाज उदंत मार्तंड समाचार पत्र निकाल कर की थी. उदंत मार्तंड का मतलब उगता हुआ सूरज यानी हिंदी पत्रकारिता का उदय. अब सवाल यह उठता है कि हिंदी पत्रकारिता के समाचार पत्र की शुरुआत पश्चिम बंगाल से क्यों? कहने का अभिप्राय यह की अहिंदी भाषी क्षेत्र से क्यों हुआ? इसका मूल कारण यह था कि पश्चिम बंगाल देश की आर्थिक राजधानी के रूप में जानी जाती थी. किसी भी व्यवसाय की शुरुआत यहीं से होती थी, क्योंकि यहां बना बनाया बाजार था. ऐसे में इस समाचार पत्र का प्रकाशन भी कोलकाता से करना पड़ा और 30 मई 1826 का दिन देश में हिंदी पत्रकारिता के प्रथम हिंदी समाचार पत्र के रूप में इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर दर्ज हो गया. यह साप्ताहिक समाचार पत्र हर मंगलवार को निकला करता था.

 

वैसे तो पत्रकारिता में बहुत सारे गौरवशाली और यादगार दिन हैं, लेकिन 196 साल पहले भारत में पहला हिंदी भाषा का समाचार पत्र 30 मई को ही प्रकाशित हुआ था. इसके पहले प्रकाशक और संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल का हिंदी पत्रकारिता के जगत में विशेष स्थान है. उदंत मार्तंड सच में हिंदी पत्रकारिता में उगते हुए सूरज का काम किया.

 

शुरु से ही हिंदी पत्रकारिता को बहुत चुनौतियों का सामना करना पड़ा. समय के साथ इनका केवल स्वरूप बदला, लेकिन तमाम चुनौतियों के साथ ही हिंदी पत्रकारिता आज ने वैश्विक स्तर पर अपने उपस्थिति दर्ज कराई है. समाचार पत्रों को बहुत भय दिखाया गया कि रेडियो आएगा अस्तित्व खतरे में हो जाएगा टीवी आएगा तो लोग कम पढ़ेगें. लेकिन किसी शायर ने कहा था कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी…. हिंदी समाचार पत्र तब भी खड़ा था और इंटरनेट डिजिटल पत्रकारिता सोशल मीडिया के आने के बाद भी टस से मस नहीं हुआ.

पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता के कोलू टोला मोहल्ले की आमड़तल्ला गली से उदंत मार्तंड के प्रकाशन की शुरुआत की थी. उस समय अंग्रेजी फारसी और बांग्ला में पहले से ही काफी समाचार पत्र निकल रहे थे, लेकिन हिंदी में एक भी समाचार पत्र नहीं निकल रहा था.

 

अंग्रेजी अखबार के बाद लंबा इंतजार करना पड़ा था हिंदी समाचार पत्र को. वैसे तो उदंत मार्तंड से पहले 1780 में एक अंग्रेजी अखबार की शुरुआत हुई थी. फिर भी हिंदी को अपने पहले समाचार-पत्र के लिए 1826 तक प्रतीक्षा करनी पड़ी. 29 जनवरी 1780 में आयरिश नागरिक जेम्स आगस्टस हिकी अंग्रेजी में ‘कलकत्ता जनरल एडवर्टाइजर’ नाम का एक समाचार पत्र शुरू किया था, जो भारतीय एशियाई उपमहाद्वीप का किसी भी भाषा का पहला अखबार था.
कानपुर में जन्मे शुक्ल संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी और बांग्ला के जानकार थे. इसके बाद उन्होंने ‘एक साप्ताहिक हिंदी अखबार ‘उदंत मार्तंड’निकालने क प्रयास शुरू किए. तमाम प्रयासों के बाद उन्हें गवर्नर जनरल की ओर से उन्हें 19 फरवरी, 1826 को इसकी अनुमति मिली.

 

इस साप्ताहिक समाचार पत्र के पहले अंक की 500 कॉपियां छपी लेकिन हिंदी भाषी पाठकों की कमी के कारण उसे ज्यादा पाठक नहीं मिल पाए, वहीं हिंदी भाषी राज्यों से दूर होने के कारण समाचार पत्र डाक द्वारा भेजना पड़ता था जो एक महंगा सौदा साबित हो रहा था. इसके लिए जुगल किशोर ने सरकार से बहुत अनुरोध किया कि वे डाक दरों में कुछ रियायत दें लेकिन ब्रिटिश सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई.
केवल डेढ़ साल ही चल सका अखबार. इसकी कुल 79 अंक ही प्रकाशित हो सके. 30 मई 1826 को शुरू हुआ यह अखबार आखिरकार 4 दिसंबर 1827 को बंद हो गया. इसकी वजह आर्थिक समस्या थी.

 

अब हम बात करते हैं आजादी के बाद की पत्रकारिता की. भारत में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना गया है.

 

अकबर इलाहाबादी ने इसकी ताकत एवं महत्व को अपने शब्दों में इस तरह अभिव्यक्त किया– ना खींचो कमान, न तलवार निकालो, जब तोप हो मुकाबिल तब अखबार निकालो.

उन्होंने प्रेस को तोप और तलवार से भी शक्तिशाली बताया अर्थात कलम को हथियार से भी ताकतवर बताया.

इसी तरह नेपोलियन ने कहा था चार विरोधी अखबारों की मारक क्षमता के आगे हजारों बंदूक की ताकत बेकार है.

मगर दिन पर दिन स्थिति में बदलाव आ रहा है पहले पत्रकारिता मिशन थी, उसके बाद प्रोफेशन बनी फिर बिजनेस का रूप पकड़ लिया उसके बाद कार्पोरेट सेक्टर ने अपना गुलाम बनाया, अब यह प्रोडक्शन पर आकर रुकी हुई है. कहने का अभिप्राय यह है कि आप ही खबर लाओ, आप ही कमाओ और कंपनी का खर्च निकालो और अपना भी.

मेरा मानना है कि संपादक राजेंद्र माथुर के बाद संपादक नाम की संस्था विलुप्त हो गई है. वर्तमान परिवेश में किसी भी समाचार पत्र या चैनल को सिर्फ संपादक नहीं चाहिए उसे संपादक के रूप में एक मैनेजर भी चाहिए. जो दोनों काम कर सके. दो नाव पर पैर रखने का मुहावरा से आप अच्छी तरह वाकिफ होंगे. जो हाल होगा वही हाल आज पत्रकारिता जगत का हो रहा है. पहले किसी समाचार पत्र का संपादक नदी में मगरमच्छ और घड़ियाल की तरह होता था उससे ऑफिस के अंदर और बाहर मतलब प्रशासन से लेकर शासन तक के लोग डरते थे. सत्ता के लोग उसके रडार पर होते थे. अब उसकी स्थिति नदी के सूखे पानी की तरह हो गई. जिस तरह नदी के सूखे पानी में रहने वाले घड़ियाल से लोग नहीं डरते लोगों से घड़ियाल डरने लगता है आज वही स्थिति संपादक की बन गई है.

अब हम बात करेंगे समाचार पत्र की गुणवत्ता पर. इसको हम चार बिंदुओं में विभाजित करते हैं.
हिंसक भाषा, रोगग्रस्त मीडिया, अधकचरे पत्रकार, फास्ट फूड मीडिया.
हिंसक भाषा का मतलब समाचार संरचना इस तरह से की जा रही है कि उसमें हिंसक भाषा का प्रयोग हो रहा है. समाचार पत्रों की हेडिंग लगती है–
राहुल गांधी ने मोदी पर हमला बोला.
भाजपा ने राहुल का मुंहतोड़ जवाब दिया.

संसद में विपक्ष हुआ आक्रामक. पाकिस्तान 80 पर ढेर.

इस तरह की हिंसात्मक भाषा का प्रयोग समाचार की संरचना और हेडलाइन में हो रहा है. इससे बचने की जरूरत है. मीडिया समाज का दर्पण होता है. इस तरह की खबरें पढ़ने के बाद और हेडलाइन देखने के बाद लोग उसका प्रयोग अपने से जुड़े लोगों के साथ करते हैं. घर में करते हैं इष्ट मित्र के साथ करते हैं. जो समाजिक सरोकार के लिए शुभ संकेत नहीं है.
हम बात करते हैं रोग ग्रस्त मीडिया की. मीडिया और सोशल मीडिया में वायरल हुई खबर की जांच की जा रही है. यहां वायरल शब्द का प्रयोग हुआ जो प्रयोग संक्रामक बीमारी के लिए होता है. ऐसी खबर जो समाज में संक्रामक बीमारी की तरह काम करती है हम उसकी पुष्टि क्यों करते हैं? हम उसके बारे में पड़ताल क्यों करते हैं? इसलिए हम कह सकते हैं कि हमारी मीडिया रोगग्रस्त हो गई है.

 

अधकचरे पत्रकार- इसका मतलब भाषा, व्याकरण और शब्दकोश को छुए बिना जो मन में आया उसे खबरों की भाषा में ढाल दिया. इसका दूसरा पक्ष यह भी है की सूचनाएं बहुत है उन तक पहुंच बनाने के लिए अशिक्षित पत्रकारों का भी सहारा लेना पड़ता है जो कि हमारे संवाद सूत्र कहे जाते हैं. उन्होंने अपनी भाषा में खबर लिखी और भेज दी लेकिन अखबार के दफ्तरों में मैन पावर कम होने के चलते उसे गंभीरता से ठीक नहीं किया जाता है. इसलिए इस तरह की त्रुटियां संभव है आने वाले दिनों में समाचार पत्रों में लोग भाषा पर ध्यान नहीं देंगे. खबरें सूचना को संप्रेषित करने का माध्यम बन जाएगी लोग खबरों को शुद्ध करके समझने लगेंगे. अब इस तरह का ट्रेंड चलने लगा है.

हम बात करेंगे फास्ट फूड मीडिया की- समाचार पत्र अब फास्ट फूड की तरह हो गई है. पाठक भी बैठकर पढ़ने की बजाए खड़े-खड़े समाचार पत्र पढ़ना पसंद करता है . वह मूल तथ्य में नहीं जाता इससे मीडिया का हास हो रहा है.
आज की पत्रकारिता कार्पोरेट जगत की पत्रकारिता हो गई है जो कि बाजार के आगे झुक गई है. पत्रकारिता के इस स्तर को उठाने की जरूरत है और इसे सत्ता से दूर रहने की आदत डालनी होगी नहीं तो आने वाले दिनों में यह हमारा अस्तित्व खतरे में डाल सकती है.

 

कहने का अभिप्राय यह है कि पत्रकारिता दूध फूंककर पीने की नहीं बल्कि छाछ फूंक कर पीने की चीज हो गई है. आज इस विधा से जुड़े लोगों को पत्रकारिता दिवस पर आत्म चिंतन करने की जरूरत है कि पत्रकारिता बेबाक रहेगी या सत्ता की गुलाम बन कर रह जाएगी. अगर बेबाक रही तो समाज राष्ट्र निर्माण के काम आएगी अगर सत्ता की कठपुतली बनी तो देश और समाज में विघटन पैदा करने का काम करेगी. लोग अपने हिसाब से अपने स्वार्थ से कलम को घूमाते रहेंगे जोकि सामाजिक सरोकार से दूर रखेगी. ना समाज का भला होगा ना देश का.

 


डॉ सुनील कुमार की विशेष रिपोर्ट

(असिस्टेंट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग, मीडिया प्रभारी
वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर)

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