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बलिया. 22-23 अगस्त 1942 की रात ब्रिटिश सेना ने बलिया में प्रवेश कर फिर से कब्जा कर लिया. इससे पहले 22 अगस्त की रात तक बलिया आजाद था. भारत के इतिहास में बलिया को सतारा और मेदिनीपुर के साथ स्वतंत्रता से पहले आजाद होने का गौरव प्राप्त है.
बलियावासियों ने आजादी का स्वाद देश के अन्य हिस्सों से पांच साल पहले ही चख लिया था. इसके लिए उन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ी. 1942 से 1944 तक बलिया में गांधी टोपी पहनकर चलने वालों की खैर नहीं थी.
मार्च 1944 में फिरोज गांधी अपने एक सहयोगी के साथ बलिया आए. वे रेलवे स्टेशन से चौक तक गए. गांधी टोपी लगाए उनके साथ भीड़ चलने लगी. उसी दिन से जनता के मन से भय का भूत उतर गया.
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बलिया की क्रांति गाथा का जयघोष तत्कालीन गवर्नर को भेजा गया. 1944 में पुरुषोत्तम दास टंडन और संपूर्णानंद भी बलिया आए. टंडन जी के लिए ठहरने की व्यवस्था नहीं हो पाई, इसलिए वे उसी दिन वापस चले गए. संपूर्णानंद जी अगले दिन गए.
अक्टूबर 1945 में जवाहरलाल नेहरू बलिया आए. भारी भीड़ ने उन्हें सुना. उन्होंने बलिया के क्रांतिकारियों को शाबाशी दी. इसके बाद 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ. बलिया जनपद में पाकिस्तान से 333 शरणार्थी आए.
विशेष कोर्ट ने सुनाई सात-सात साल की सजा
23 अगस्त की शाम चार बजे जगदंबा प्रसाद की विशेष कोर्ट ने बिना बचाव का अवसर दिए सभी क्रांतिकारियों को सात-सात वर्ष की सजा और 20-20 बेत की सजा सुनाई. चौक में सभी को 20-20 बेत लगाए गए. इसके बाद भी अंग्रेजी शासन के अधिकारियों को संतुष्टि नहीं हुई तो उन्हें नंगा करके 20-20 बेत लगाए गए.
अंग्रेजों के अत्याचार का बड़ा नजारा बलिया में देखने को मिला. कलेक्टर जे. निगम के इस्तीफा देने के बाद शहर में फौजियों का आतंक फैल गया. रास्ते से गुजर रहे निर्दोष और अबोध लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गईं. बलिया के अनेक गांवों में जलियांवाला बाग जैसा दृश्य दिखाई दिया.
लगभग 15 स्थानों पर अंधाधुंध गोलियां चलीं, जिसमें लगभग सभी लोग मारे गए. अनेक लोग गंभीर रूप से घायल हुए. बलिया शहर में सेना के सिपाहियों ने संपन्न परिवारों को लूटने और आग लगाने का काम शुरू कर दिया. सतनी सराय में गंगा विश्वनाथ और भृगु आश्रम में रामनाथ के मकान में आग लगा दी गई.
शहर में राधा कृष्ण, बच्चा बाबू स्वर्णकार, वस्त्र व्यवसायी गोपीनाथ नारायण राम, सेठ बाल गोविंद, राधा कृष्ण प्रसाद, देवी राम, बेनी माधव और जग्गू लाल सहित कई लोगों को आतंकित कर मनमाना धन वसूला गया. उनकी दुकानों को भी लूटा गया.
हनुमानगंज निवासी शिव प्रसाद की बलिया और हनुमानगंज स्थित दोनों कोठियों से कीमती सामान लूट लिया गया. केवल हनुमानगंज की कोठी से लूटा गया सामान 19 बैलगाड़ियों पर लादकर पुलिस लाइन लाया गया. इसी क्रम में चंद्रिका प्रसाद और गंगा प्रसाद गुप्त आदि की दुकानें भी लूटी गईं. इतना आतंक फैलाया गया कि सभी कांग्रेसी नेता भेष बदलकर भूमिगत हो गए.
गांवों में भी बरपा अंग्रेजी फौज का कहर
सुखपुरा जाते समय ब्रिटिश फौज के सैनिकों ने करनई गांव के सरजू तिवारी की बंदूक के कुंदे से पिटाई की. चंडी प्रसाद को गोली मार दी गई. इसके बाद सुखपुरा में महंथ गिरी के दो कुत्तों और हाथी को गोली मार दी गई. उनके घर में आग लगा दी गई. अंत में महंथ गिरी अपनी प्राण रक्षा के लिए 40 फीट की ऊंचाई से कूद पड़े.
गौरी शंकर सरकार की आंखों में कुछ घुसाकर निर्मम हत्या की गई. कुलदीप सिंह का अपहरण कर उन्हें लापता कर दिया गया. रचना में हाजिर वक्त अंसारी और ऋषि लाल द्वारा सीताराम कलवार, विश्वनाथ राम कलवार, विश्वनाथ राम, बैजनाथ सरकार तथा श्याम किशोर शर्मा को पकड़कर गुप्त यातनाएं दी गईं.
सरदारपुर में विश्वनाथ सिंह, हनुमान, चंद्रमा सिंह, रघुपति सिंह और रामवृक्ष सिंह को लूटा गया. रामेश्वर तेली को हाथी के पैर से बांधकर घसीटा गया, जिससे वे बेहोश हो गए. तीन महिलाओं को पकड़कर थानेदार ने उनके वस्त्र और आभूषण अपने सामने उतरवा लिए. चरौवा गांव में मशीनगन से गोलियों की बौछार की गई. लाखों की संपत्ति लूटकर घरों में आग लगा दी गई. शिव शंकर सिंह और मंगल सिंह के साथ-साथ अनेक जानवर भी मारे गए.
बस्ती में फौजी गाना सुनकर जनता क्रोध से उबल पड़ी. हजारों की संख्या में लोगों ने फौज को ललकारा. इसके बाद फौजियों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी.
क्रांतिकारियों पर यातनाओं का सिलसिला
जनपद के प्रसिद्ध क्रांतिकारी महानंद मिश्रा फरारी के दौरान भुसावल छपरा निवासी अनुग्रहित ठाकुर के घर गिरफ्तार हुए. थाने पर एक सप्ताह तक उन्हें प्रतिदिन मुर्गा बनाकर पीटा जाता रहा. महिलाओं के गहने और वस्त्र उतरवा लेना भी फौजियों के लिए आम बात हो गई थी. अनेक स्थानों पर उनके साथ दुर्व्यवहार और बलात्कार भी किया गया.
हरदिया के शिवपूजन सिंह की पत्नी को बच्चा हुए तीन दिन ही हुए थे, फिर भी उनके आभूषण छीन लिए गए. सिवानकला की राधा कृष्ण की माता जी को रातभर तालाब में खड़ा रखा गया.
अंग्रेजों ने बलियावासियों को पांच दिन की स्वतंत्रता के बाद उत्पीड़न के जरिए जगह-जगह प्रताड़ित किया कि दोबारा आजाद होने का नाम न लें. इसके बावजूद अंग्रेजों के सामने बलियावासियों ने कभी घुटने नहीं टेके.
कृष्णकांत पाठक, वरिष्ठ पत्रकार, बलिया
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