प्रेमचंद जयंती की पूर्वसंध्या पर साहित्य, समाज और मानव-मूल्यों पर हुआ गंभीर विमर्श
आज़मगढ़ के श्री गांधी पीजी कॉलेज में प्रेमचंद जयंती की पूर्वसंध्या पर आयोजित परिसंवाद में वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य को सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय मूल्यों का दस्तावेज बताया. कार्यक्रम में साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर चर्चा के साथ लोकनृत्य और कविता पाठ का भी आयोजन किया गया.
आज़मगढ़ के श्री गांधी पीजी कॉलेज, मालटारी में प्रेमचंद जयंती की पूर्वसंध्या पर हिन्दी विभाग के सहयोग से प्रगतिशील लेखक संघ, भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) और लोकायन संस्कृति न्यास के संयुक्त तत्वावधान में “प्रेमचंद. साहित्य, समाज और मानव मूल्य” विषय पर परिसंवाद, लोकनृत्य और कविता पाठ का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में साहित्य और समाज के बदलते संबंधों के बीच प्रेमचंद के विचारों की प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा हुई.
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि और प्रगतिशील लेखक संघ, आज़मगढ़ के अध्यक्ष डॉ. राजाराम सिंह ने की. मुख्य अतिथि हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और हरिश्चन्द्र पीजी कॉलेज, वाराणसी के पूर्व प्राचार्य डॉ. गया सिंह ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज की आत्मा का दस्तावेज है. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा के प्रश्नों को अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा. यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी समाज को दिशा देने का काम करता है.
मुख्य वक्ता डॉ. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल यथार्थ का चित्रण नहीं करता, बल्कि समाज में बदलाव की चेतना भी जगाता है. उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और शोषित वंचित वर्गों के पक्ष में प्रेमचंद की वैचारिक प्रतिबद्धता को आज भी प्रेरणादायी बताया.
विशिष्ट अतिथि डॉ. द्विजराम यादव ने प्रेमचंद की रचनाओं में सामाजिक समरसता और शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डाला. डॉ. राम अवध सिंह यादव ने कहा कि प्रेमचंद की ग्राम्य चेतना, किसान जीवन और भारतीय संस्कृति का यथार्थ चित्रण उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाता है. प्रो. अखिलेश चंद्र ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में मानवीय संवेदना, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलित समन्वय दिखाई देता है.
कार्यक्रम में हरिमंदिर पाण्डेय की विशेष उपस्थिति रही. परिसंवाद का संयोजन और संचालन प्रो. हसीन खान ने किया. उन्होंने सभी वक्ताओं और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए प्रेमचंद के साहित्य की समकालीन उपयोगिता पर प्रकाश डाला.
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. राजाराम सिंह ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य संघर्ष, श्रम, समानता और मानव मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति है. उन्होंने कहा कि बढ़ती सामाजिक विषमताओं के दौर में प्रेमचंद की विचारधारा नई पीढ़ी को संवेदनशील और लोकतांत्रिक समाज के निर्माण की प्रेरणा देती है.
परिसंवाद के बाद लोक कलाकारों ने लोकनृत्य प्रस्तुत किया. इसके बाद आयोजित कविता पाठ में जनपद के कवियों ने सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं और प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत पर आधारित अपनी रचनाओं का पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने सराहा.
कार्यक्रम के संरक्षक दिनेश कुमार राय और स्वागताध्यक्ष प्रो. शुचिता श्रीवास्तव ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया. आयोजन समिति में डॉ. वी.सी. यादव, बैजनाथ गंवार और राजनाथ यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अंत में बालेदीन बेसहारा ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और सहयोगी संस्थाओं के प्रति आभार व्यक्त किया. कार्यक्रम में श्री घनश्याम यादव, राजकुमार आशीर्वाद, सत्यम प्रजापति, श्री अभिराज बेदर्दी, कृष्णदेव घायल, डॉ. दानबहादुर यादव, डॉ. राजेश यादव, डॉ. दुर्गेश, डॉ. नितेश, डॉ. संदीप, प्रो. प्रेमचंद, डॉ. शुभ्रा श्रीवास्तव, प्रो. के. एन. गुप्त सहित महाविद्यालय के शिक्षक, साहित्यकार और गणमान्य लोग उपस्थित रहे.

