21 अगस्त 1942 को बलिया में जनक्रांति अपने निर्णायक दौर में पहुंच गई. सिकंदरपुर थाने पर करीब 20 हजार क्रांतिकारी पहुंचे. इनमें हरदिया निवासी शिवपूजन सिंह, लीलकर निवासी हीरा राय, बालूपुर निवासी बलदेव प्रसाद, बालूपुर निवासी फतेह बहादुर लाल, परसोत्तम पट्टी निवासी लक्षण चौधरी, पन्दह निवासी छोटेलाल और मोहनापार निवासी स्वामीनाथ सिंह प्रमुख थे.
क्रांतिकारियों के इस विशाल जनसमूह ने सिकंदरपुर थाने पर तिरंगा फहराया. थानेदार असफाक हुसैन सैयद बदरू सलाम के घर जाकर छिप गया. इस प्रकार बलिया की अभूतपूर्व क्रांति के परिणामस्वरूप स्वराज सरकार का संचालन शुरू हो गया और बलिया पूरी तरह स्वतंत्र हो गया.
बलिया के स्वतंत्र होने की सूचना जब प्रांत के गवर्नर हैलट को मिली तो वह तिलमिला उठा. उसने नेदरसोल को प्रशासक बनाकर बलिया पर दोबारा अधिकार करने की जिम्मेदारी सौंपी.
बलिया में स्वराज सरकार की स्थापना के बाद काम शांतिपूर्वक चल रहा था. इसी दौरान बलिया के अंग्रेज कलेक्टर जे. निगम ने चित्तू पांडे के साथ हुए समझौते का उल्लंघन कर गोली चलवा दी. माल गोदाम और बालेश्वर मंदिर के पास दो लोगों की मौत हो गई.
इसके बाद सिकंदरपुर थाने पर विशाल जनसमूह पहुंचा और वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया. थाने के सभी कागजात जला दिए गए. थानेदार ने दो बंदूकों के साथ अपनी वर्दियां भी सौंप दीं. नेता ऋषि पूजन सिंह ने मोर्चा संभाला. सिकंदरपुर पुलिस चौकी और बीज भंडार को लूटा गया, जिससे वहां अंग्रेजी शासन पूरी तरह समाप्त हो गया.
रसड़ा के रामलीला मैदान में निर्णय लिया गया कि तहसीलदार से खजाने की ताली लेकर तहसील पर पूरी तरह कब्जा किया जाए. लेकिन फौज के पहुंच जाने के कारण यह कार्य नहीं हो सका.
नवानगर पोस्ट ऑफिस को छात्रों ने घेर लिया और वहां का सामान जला दिया. हुसैनपुर में गांजा की दुकान, मवेशीखाना और पंचायत के कागजात जला दिए गए.
गड़वार थाने पर शिवपूजन सिंह और जगमोहन सिंह के आदेश पर क्वार्टरों को फूंक दिया गया. बुढ़वा गांव में छिपे थानेदार राजदेव सिंह ने बंदूक, रिवॉल्वर, कारतूस, हथकड़ी और भाले खुद सौंप दिए.
डिप्टी कलेक्टर रामलगन सिंह फौजी सहायता के लिए बनारस कमिश्नर के यहां से आदेश लेकर लौट रहे थे. लक्ष्मणपुर के लोगों ने उन्हें पकड़ने की योजना बनाई. नरही के कार्यकर्ता बृजनंदन राय और जगत नारायण लाल मंगई नदी का पुल पार करते समय पकड़ लिए गए.
डिप्टी कलेक्टर की एक बंदूक, 14 कारतूस और एक रिवॉल्वर छीनकर सामानों को कब्जे में ले लिया गया. लक्ष्मी शंकर की मंगनी की कार भी ले ली गई. इसमें राम जी तिवारी और लक्ष्मी शंकर त्रिवेदी प्रमुख थे. डिप्टी साहब भागकर एक महिला के यहां शरण लेने को मजबूर हुए.
जन आंदोलन के तेज रूप को देखते हुए अंग्रेज नौकरशाही के चौकीदार से लेकर कलेक्टर तक को नतमस्तक होकर आत्मसमर्पण करना पड़ा. 12 दिनों तक चली इस पूर्ण अहिंसा, आत्मजनशक्ति और अद्भुत क्रांति ने अपने लक्ष्य को प्राप्त किया और विश्व के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया. बलिया जिले के सभी केंद्रों पर ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया.
कृष्णकांत पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

