प्रेमचंद की ‘फ़ातिहा’ : जहाँ मोहब्बत और बदले का आमना-सामना होता है.
मुंशी प्रेमचंद की कहानी “फ़ातिहा” केवल एक सैनिक की कथा नहीं, बल्कि प्रेम, ईर्ष्या, प्रतिशोध, करुणा, भ्रातृत्व और वात्सल्य जैसे मानवीय भावों का गहरा दस्तावेज़ है. नाज़िर, तूरया और मेजर हिम्मत सिंह के जीवन के माध्यम से कहानी इंसानी रिश्तों की जटिलता, त्याग और क्षमा के दुर्लभ पक्षों को प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है.
मुंशी प्रेमचंद को “कथा-सम्राट” यूँ ही नहीं कहा गया है. यह आज भी शत-प्रतिशत प्रासंगिक है. मानव के हर भाव, हर स्थिति और मनःस्थिति को उन्होंने बारीकी से छुआ है. ग़रीबी, क्रोध, विषाद, ईर्ष्या, लाचारी के साथ-साथ सभी भाव उनकी कहानियों में प्रतिबिंबित होते हैं.
वैसे तो पाठ्यपुस्तकों में उनकी कहानियाँ पढ़ते हुए अनगिनत लोग किशोरावस्था से प्रौढ़ावस्था तक पहुँच गए. हामिद और चिमटे की कहानी हो, अलगू और जुम्मन की कहानी हो या बेमेल विवाह की कहानी ‘निर्मला’. प्रेमचंद की लिखी कहानियों में “फ़ातिहा” एक बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी है. कहानी में एक अनाथ बालक का जीवन, परस्पर प्रेम, ईर्ष्या, क्रोध, भ्रातृत्व-प्रेम और वात्सल्य जैसे भावों का सुंदर समावेश है.
बचपन में ही माँ-बाप से बिछड़ा नाज़िर किसी यतीमखाने में पलता-बढ़ता है. बड़ा होने पर छह फुट का गठीला जवान नाज़िर फ़ौज में भर्ती हो जाता है. पलटन के मुखिया मेजर सरदार हिम्मत सिंह उसे बहुत मानते थे. उस सीमांत इलाके में उन दिनों अफ़रीदी कबीले का काफ़ी आतंक था. वे फ़ौजियों से असलहा-बारूद के अलावा रोटियाँ भी लूट लेते थे.
इसी दौरान एक दिन नाज़िर मुठभेड़ में कबीले के सरदार की हत्या कर देता है. इसके बाद एक कबीलाई युवती मेजर हिम्मत सिंह के ठिकाने के सामने थूकती हुई गुज़र जाती है. कबीले के सरदार की हत्या करने के बाद से ही नाज़िर कुछ असहज महसूस करने लगा था. उसने मेजर से यह बात कही थी. मेजर ने उसकी हौसला-अफ़ज़ाई करते हुए उसका साहस बढ़ाया. नाज़िर ने भी उस युवती को देखा और असहज हो गया. युवती के चले जाने के बाद नाज़िर ने मेजर साहब से पूछा कि क्या वह उसे जानते हैं. सरदार हिम्मत सिंह ने हाँ में जवाब दिया.
जब नाज़िर ने ज़ोर देकर पूछा तो सरदार हिम्मत सिंह ने उसे पूरा वाकया सुनाया.
एक बार कबीलों के ख़िलाफ़ जारी अभियान के दौरान कबीले का सरदार हैदर ख़ाँ मेजर साहब का अपहरण कर ले गया. पकड़कर लाने के बाद सरदार ने मेजर से अपनी पलटन को फिरौती भेजने के लिए पत्र लिखने को कहा. मेजर साहब ने जब दो सौ रुपये के बारे में कहा तो हैदर ख़ाँ ने दो हज़ार रुपये लिखने को कहा, अन्यथा उनकी हत्या कर दी जाएगी. उन्हें एक गहरे कुएँ में डालकर ऊपर से एक चट्टान रख दी गई. उस चट्टान में केवल एक सुराख था, जिसके ज़रिये उन्हें रोटी-पानी दिया जाता था. इस तरह उसी कुएँ में मेजर साहब को रोज़ एक बार रोटी-पानी दिया जाता. कुछ दिनों बाद मेजर साहब घबराने लगे, क्योंकि फ़ौज की तरफ़ से कोई रकम नहीं भेजी गई थी. सीमांत प्रदेश में रहते-रहते उन्होंने पश्तो ज़बान भी थोड़ी-बहुत सीख ली थी. घबराहट दूर करने के लिए वह एक पश्तो गीत गुनगुनाने लगते.
उनको खाना देने आने वाली युवती भी वह गीत सुनकर मुग्ध हो गई. जब गाना समाप्त हो गया तो युवती ने फिर एक बार गाने के लिए कहा. लड़की की आवाज़ सुनकर मेजर साहब चौंक गए. युवती ने कहा कि अगर वह रोज़ यह गीत सुनाएँगे तो उन्हें दो बार रोटी-पानी मिलेगा. गीत सुनकर वह विह्वल हो जाती और उसकी आँखों से आँसू निकल पड़ते.
तूरया ने कहा, “तुम रोज़ यह गीत सुनाया करो. मैं तुम्हें और रोटियाँ दूँगी.”
धीरे-धीरे दोनों के बीच प्रेम बढ़ने लगा. उधर, फ़ौज की तरफ़ से फिरौती न भेजने के कारण मेजर साहब की चिंता बढ़ती जा रही थी. सरदार ने पंद्रह दिनों की मोहलत देते हुए कहा था कि रकम न मिलने पर मियाद पूरी होने के अगले दिन क़त्ल कर दिया जाएगा. इसी बीच कबीले का सरदार कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चला गया. अवसर का लाभ उठाकर तूरया ने मेजर साहब से ठिकाने पर पहुँचकर फिरौती भेजने का वादा लिया और उन्हें आज़ाद कर दिया.
इस तरह दिन-महीने बीत गए. मेजर साहब भी इस घटना को लगभग भूल गए. एक दिन मूंगे बेचने वाली एक युवती ने उनके घर पर दस्तक दी. मेजर साहब ने ही दरवाज़ा खोला. वह तूरया को पहचान नहीं पाए. तभी उनके कमरे में एक महिला आई.
मूंगे बेचने वाली ने उनके बारे में पूछा. जवाब मिला कि वह उनकी पत्नी हैं. तभी तूरया ने अपना नक़ाब हटाया और कटार निकालकर एक झटके में महिला के सीने में उतार दी. मेजर साहब ने उससे झूठ बोला था कि उनकी पत्नी मर गई है और दोनों बच्चे अकेले हैं. इस घटना के बाद तूरया अक्सर मेजर साहब के ठिकाने के पास आकर बच्चों को कुछ-न-कुछ दे जाती थी.
हैदर ख़ाँ के मरने के बाद एक रात नाज़िर को लगा कि उसे मारने के लिए कोई उसके कमरे में घुस आया है. अँधेरे में भी वह चौकन्ना हो गया. नाज़िर समझ गया कि वह कोई महिला थी. दोनों में हाथापाई शुरू हो गई. इस दौरान नाज़िर ने तूरया से छुरा छीन लिया. उसके हाथ उठाते ही वह छुरा उसकी छाती में उतर गया. वह एक बुत की तरह खामोश हो गई. उसे झिंझोड़ने पर उसने इतना ही कहा, “तू मेरा भाई है और तूने अपने बाप को मारा है.” तूरया और नाज़िर, दोनों के हाथों पर साँप की आकृति गुदी हुई थी.
सारी कहानी सुनकर मेजर साहब नाज़िर के कमरे में गए, जहाँ तूरया बैठी हुई थी. देखते ही उन्होंने कहा, “कैदी, तुम वही गीत फिर गाओ.” जब मेजर साहब ने नाज़िर से तूरया का हाथ माँगा तो तूरया ने मना कर दिया. उसने कहा, “मैं दोनों बच्चों की माँ बन जाऊँगी.”
कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने इस कहानी में प्रेम, क्रोध, प्रतिशोध, भ्रातृत्व-स्नेह, करुणा और वात्सल्य के भावों का अत्यंत कुशलता से निरूपण किया है.

