10 अगस्त 1942: सड़कों पर उतरे छात्र, बलिया में आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार

10 august 1942 bagi ballia

9 अगस्त को बंबई से आई खबर ने बलिया को झकझोर दिया था. 10 अगस्त को उसका असर सड़कों पर साफ दिखाई देने लगा. बलिया शहर में स्कूल बंद हो गए और विद्यार्थी टोलियों में निकल पड़े. देशभक्ति के नारों से शहर और आसपास के इलाके गूंजने लगे. आंदोलन अब सिर्फ नेताओं और कांग्रेस कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रह गया था.

10 अगस्त 1942 की सुबह 8 बजे बलिया शहर के ओक्डेनगंज पुलिस चौकी से सटे पूर्वी चौराहे पर 1942 की क्रांति का शंखनाद हुआ. उमाशंकर सोनार और सूरज प्रसाद के नेतृत्व में लोगों ने गगनभेदी नारे लगाए. इसके बाद जुलूस टाउन स्कूल, मेस्टन स्कूल और माल गोदाम होते हुए कचहरी की ओर बढ़ चला.

माल गोदाम पर विश्वनाथ प्रसाद मरदाना ने जुलूस को संबोधित किया. उन्होंने लोगों से अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे संघर्ष में कूद जाने की अपील की. जुलूस में शामिल लोगों के नारों और बढ़ती भीड़ से साफ था कि 9 अगस्त को मिली खबर अब सिर्फ खबर नहीं रह गई थी. वह आंदोलन में बदलने लगी थी.

जिला प्रशासन के इतिहास में भी 10 अगस्त का यह घटनाक्रम दर्ज है. इस दिन बलिया के सभी स्कूल बंद रहे और विद्यार्थी टोलियों में देशभक्ति के नारे लगाते हुए बाहर निकले. छात्रों की यह भागीदारी आंदोलन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ थी.

1942 का विद्यार्थी आज के विद्यार्थी जैसा नहीं था. उसके हाथ में मोबाइल नहीं था. सोशल मीडिया नहीं था. किसी आंदोलन को वायरल करने के लिए इंटरनेट नहीं था. लेकिन उसके पास सड़क थी, नारे थे, साथी थे और अंग्रेजी राज के खिलाफ गुस्सा था.

यही वजह थी कि छात्र आंदोलन ने 1942 की लड़ाई को एक नया विस्तार दिया. अब आंदोलन सिर्फ कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहा. स्कूलों के युवा भी सड़कों पर उतर आए थे. उनकी मौजूदगी ने आंदोलन को शहर के आम लोगों के बीच भी और मजबूत किया.

10 अगस्त का दिन यहीं नहीं रुका. 9 अगस्त को आई खबर और 10 अगस्त को सड़कों पर उतरे छात्रों और आम लोगों ने अगले दिन की बड़ी चुनौती की जमीन तैयार कर दी थी. 11 अगस्त को छात्र और आम लोग फिर जुलूस लेकर निकलने वाले थे.

बलिया में अब आंदोलन केवल अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाने तक सीमित नहीं था. वह धीरे-धीरे प्रशासन को चुनौती देने लगा था. अंग्रेजी सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता यही थी कि आंदोलन किसी एक नेता के आदेश का इंतजार नहीं कर रहा था. वह अपने आप फैल रहा था और बलिया के लोग उसकी कमान खुद संभाल रहे थे.

कृष्णकांत पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

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