बलिया LIVE पर आज से 23 अगस्त तक बागी बलिया पखवाड़ा शुरू हो रहा है. पूरे पखवाड़े हर दिन बलिया के उस इतिहास की एक कहानी सामने आएगी, जिसने देश की आजादी की लड़ाई में इस जिले को अलग पहचान दी.
यह सिर्फ तारीखों और घटनाओं की कहानी नहीं है. इसमें संघर्ष, साहस, सपने, विद्रोह और वह जिद शामिल है, जिसने बलिया के लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के सामने खड़ा किया.
1942 में जब देशभर में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन की आवाज बुलंद हुई, तो उसकी गूंज बलिया तक भी पहुंची. यहां आंदोलन ने ऐसा रूप लिया कि कुछ समय के लिए अंग्रेजी प्रशासन को पीछे हटना पड़ा और बलिया में अपना शासन खड़ा करने की कोशिश हुई.
लेकिन बागी बलिया की कहानी सिर्फ 1942 तक सीमित नहीं है. इसके पीछे 1857 की वह चिंगारी भी है, जिसे बलिया की धरती से जुड़े मंगल पांडे के नाम के साथ याद किया जाता है. आगे चलकर 1942 में चित्तू पांडे जैसे नेताओं ने इसी बगावती तेवर को नए दौर में आगे बढ़ाया.
इस कहानी का एक बेहद दिलचस्प किरदार जगदीश्वर निगम भी हैं. अंग्रेजी शासन के अधिकारी होते हुए भी उनका नाम 1942 के बलिया आंदोलन के सबसे असाधारण प्रसंगों से जुड़ता है.
मंगल पांडे, चित्तू पांडे और जगदीश्वर निगम. तीन अलग-अलग भूमिकाएं, और ऐसी कहानी, जिसके केंद्र में बलिया का स्वतंत्रता संग्राम है.
बागी बलिया पखवाड़े के दौरान आज से 23 अगस्त तक हर दिन एक नई कहानी सामने आएगी. इसमें बताया जाएगा कि किस दिन क्या हुआ, संघर्ष कैसे बढ़ता गया, कब अंग्रेजी प्रशासन की पकड़ कमजोर पड़ी, बलिया ने अपनी सरकार कैसे खड़ी की और उसके बाद क्या हुआ.
बलिया LIVE का यह खास सफर उस दौर को फिर से सामने लाने की कोशिश है, जब बागी बलिया के लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी थी.
बागी बलिया की कहानी, बलिया LIVE के साथ.

