20 अगस्त 1942 को कांग्रेस के प्रमुख नेता चित्तू पांडे को बलिया का शासन अध्यक्ष मनोनीत किया गया. उन्होंने जिलाधिकारी का कार्यभार संभालते ही आदेश दिया कि जनपद के प्रत्येक गांव में पंचायत गठित की जाए तथा स्वयंसेवकों की भर्ती की जाए. ये स्वयंसेवक रात में धन और जन की सुरक्षा के लिए पहरा देते.
पंचायतों को आपसी समझौता कराने का अधिकार भी दिया गया. इस तरह चित्तू पांडे के शासन में कहीं भी किसी प्रकार की अप्रिय घटना नहीं हुई.
नेताओं की बैठक में जिले के अन्य प्रशासनिक केंद्रों पर अधिकार जमाने की जिम्मेदारी बलिया जनपद के प्रमुख क्रांतिकारियों महानंद मिश्र, राजेश्वर त्रिपाठी, विश्वनाथ चौबे और पारस मिश्र को सौंपी गई. इन लोगों ने गड़वार और बेल्थरा रोड में कई सफलताएं हासिल कीं. गड़वार के थानेदार वंश गोपाल सिंह गांव में छिपे हुए थे. क्रांतिकारियों ने उन्हें ढूंढ निकाला और थाने का सभी सामान अपने कब्जे में ले लिया.
बलिया में भारतीयों के हाथ प्रशासन का प्रभार आने के बाद लोगों में काफी उत्साह देखने को मिला. जनपद के कई थाना क्षेत्रों में ब्रिटिश हुकूमत के अधीन काम करने वाले अधिकारी इस आदेश के बाद भाग खड़े हुए.

अदम्य इच्छाशक्ति और राष्ट्रभक्ति के बल पर संघर्षों के बाद 20 अगस्त 1942 को बलिया को पूर्ण स्वतंत्र घोषित किया गया. चित्तू पांडे के नेतृत्व में एक लोकप्रिय सरकार गठित की गई. नवनियुक्त जिलाधिकारी चित्तू पांडे ने जिला प्रशासन से जुड़े अधिकारियों के साथ कई बैठकें कीं. 20 अगस्त को जनपद में शांति व्यवस्था पूरी तरह कायम रही.
बलिया की क्रांति कथा से जुड़े स्मारक आज भी उस दौर की याद दिलाते हैं. बैरिया में 18 अगस्त 1942 को थाना पर झंडा फहराए जाते समय शहीद हुए लोगों की स्मृति में थाना के सामने बना शहीद स्मारक उस वीरगति की कहानी को जीवित रखता है. सुखपुरा का शहीद स्मारक भी 1942 की कथा का गवाह है.
बेल्थरा रोड के दयानंद विद्यालय के प्रांगण में स्थित अमर शहीद स्मारक, चरौवां का शहीद स्तंभ और बसंतपुर में बन रहा शहीद स्मारक इतिहास के साथ नए भूगोल का सृजन करते हैं. फेफना और मनियर के स्मारक भी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं.
शहीद मंगल पांडे की स्मृति में नगवा और कदम चौराहा पर लगी उनकी मूर्तियां बलिया की 1857 की क्रांति में उनकी अगुवाई को प्रस्तुत करती हैं. चंद्रशेखर आजाद, चित्तू पांडे और पंडित रामदहीन ओझा की मूर्तियां शहीदों और सेनानियों के प्रति समर्पण और श्रद्धा का भाव प्रस्तुत करती हैं. कुंवर सिंह की मूर्ति स्थापना से इस दिशा में एक और अध्याय जुड़ गया है.
जनपद के ब्लॉकों पर लगे शहीदों और सेनानियों के स्तंभ भी लोगों को अपने अतीत में झांकने को मजबूर करते हैं. इन स्मारकों की सफाई, रंगाई-पुताई और सम्मान की परंपरा कायम रखना जरूरी है. समय-समय पर इन स्थानों पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने की परंपरा भी कायम रखनी होगी.

