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17 अगस्त 1942. बलिया में नागपंचमी के दिन आजादी की लड़ाई अब ऐसे दौर में पहुंच चुकी थी जहां अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती दी जाने लगी थी। यहां याद दिलाते चलें कि यह एक अनोखा संयोग ही है आज 85 साल बाद जब हम उस दिन को याद कर रहे हैं तो आज भी नागपंचमी है और 17 अगस्त 1942 को भी नागपंचमी ही थी.
इससे एक दिन पहले आजादी की मांग कर रही महिलाओं पर ब्रिटिश हुकूमत ने बहुत अत्याचार किया था। श्रीमती जानकी देवी, कांति जी, धूपा देवी, लखरानी, श्याम सुंदरी और गायत्री देवी सहित कई क्रांतिकारी महिलाओं को यातनाएं दी गईं। उन्हें 24 घंटे तक पानी टपक रहे कमरे में रखा गया और फिर छोड़ दिया गया।
महिला क्रांतिकारियों पर अत्याचार की जानकारी जब पुरुष क्रांतिकारियों को हुई, तो 17 अगस्त 1942 को उन्होंने रसड़ा रेलवे स्टेशन के डाकघर में आग लगा दी गई। रसड़ा तहसील सहित कई स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। सहतवार में भी लोगों ने थाने को घेर लिया। थानेदार को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इसके बावजूद थाना फूंक दिया गया।
पूरे इलाके में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा था। 17 अगस्त के दिन आजादी की मांग अखाड़े में उतर आई और रसड़ा में यह आक्रोश बड़े संघर्ष में बदल गया।
17 अगस्त का दिन बलिया के इतिहास में रसड़ा कांड और बलिदान दिवस के रूप में दर्ज हो गया। गोलीकांड में पांच स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए। मानव रक्त से स्वतंत्रता की लड़ाई का इतिहास लिख दिया गया।
इस आंदोलन के लिए जनता को जागरूक करने वाले सेनानियों में राजेश्वर त्रिपाठी और विश्वनाथ चौबे का नाम आदर के साथ लिया जाता है। दोनों ने अपने प्रयासों से राष्ट्रीय आयोजनों के जरिए जनता को जागरूक किया था।
17 अगस्त 1942 इसी जागरूकता का एक ज्वलंत प्रमाण बन गया। नौजवानों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और सक्रिय प्रशिक्षण ने आंदोलन को नई ताकत दी। जनजीवन में राष्ट्रीयता की भावना भी गहरी होती गई।
आंदोलन से पहले ही प्रमुख कार्यकर्ता यूसुफ कुरैशी और राजेश्वर त्रिपाठी गिरफ्तार किए जा चुके थे। इसके बाद क्षेत्र के दूसरे सेनानियों और युवकों ने आंदोलन की बागडोर संभाल ली।
इनमें हरगोविंद सिंह, नरसिंह नारायण, रामदेव प्रसाद, सत्यनारायण सिंह, श्रीकृष्ण मिश्रा, परमहंस मिश्रा, इंद्रदेव सिंह खरवार, अहमद अली, चंद्रमा सिंह, हनुमान प्रसाद, गिरधारी सिंह, विश्वनाथ सिंह, सरजू पांडे, केदार पांडे, केदारनाथ सिंह, विश्वनाथ चौबे, नंदलाल शर्मा, हाजी बॉक्स अंसारी, ऋषि लाल अग्रवाल, सीताराम कलवार, गौरी शंकर, बैजनाथ प्रसाद, अयूब, विंध्याचल लोहार, रोपण भर, कपिल देव सिंह और राम नगीना सिंह सहित कई सेनानियों के नाम गर्व के साथ लिए जाते हैं।
इन सेनानियों ने आंदोलन की बागडोर संभाली और उसका संचालन किया। गांव-गांव में डाकघर जला दिए गए। क्षेत्र के थानों पर कब्जा किया गया। रेलवे स्टेशनों में आग लगाई गई और रेल लाइनें उखाड़ दी गईं।
राष्ट्रीय नेताओं की मुंबई और अन्य स्थानों पर गिरफ्तारियों से पूरा क्षेत्र पहले ही आक्रोशित था। इसी माहौल में रसड़ा तहसील पर कब्जा करने और थाने पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की साहसिक योजना बनाई गई।
नाग पंचमी के दिन 50 हजार से अधिक लोगों का हुजूम रसड़ा विजय के लिए उमड़ पड़ा। संस्कृत, व्यायाम, कुश्ती और दंगल का पर्व नाग पंचमी उस दिन आजादी की लड़ाई का ऐतिहासिक दिन बन गया।
रसड़ा के तहसीलदार भी जनता के दबाव में गांधी टोपी पहनने को मजबूर हो गए। पूरा शहर जनता के सैलाब से जनसमुद्र में बदल गया था। 17 अगस्त 1942 को बलिया ने फिर दिखा दिया कि अब आजादी की मांग को दबाना अंग्रेजी हुकूमत के लिए आसान नहीं था।
कृष्णकांत पाठक,वरिष्ठ पत्रकार, बलिया
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