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रविशंकर पांडेय,बांसडीह,बलिया
बांसडीह,बलिया. “बांसडीह बलिदान डीह, धन्य-धन्य यह धरा-धाम, जो सन 42 में आजाद हुआ…” अगस्त क्रांति दिवस की परंपरा के तहत मंगलवार को बांसडीह की धरती एक बार फिर स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास की साक्षी बनी। बलिया से बैरिया होते हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं उत्तराधिकारियों का करीब 20 सदस्यीय दल बांसडीह पहुंचा।
दल के पहुंचते ही भारत माता की जय और वंदे मातरम के नारों से पूरा नगर गूंज उठा। शहीदों की याद में निकले इस कार्यक्रम में हर चेहरे पर देशभक्ति और वीर सपूतों के प्रति सम्मान साफ नजर आया।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के अध्यक्ष गंगा सागर सिंह के नेतृत्व में सेनानी उत्तराधिकारी और उनके परिवार के सदस्य बांसडीह कचहरी चौराहे पहुंचे। यहां प्रशासन की ओर से उपजिलाधिकारी डॉ. पुष्कर मिश्रा, तहसीलदार नितिन कुमार सिंह और प्रभारी निरीक्षक राकेश सिंह तथा सेनानी उत्तराधिकारी संगठन बांसडीह के अध्यक्ष प्रतुल कुमार ओझा ने सभी का फूल-मालाओं से स्वागत किया।
स्वागत के बाद सेनानी उत्तराधिकारियों ने सबसे पहले सप्तर्षि द्वार स्थित शहीद स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर अमर शहीदों को नमन किया। इसके बाद पूरा दल पैदल मार्च करते हुए शहीद पंडित रामदहीन ओझा की प्रतिमा तक पहुंचा। प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस दौरान देशभक्ति के नारों से वातावरण गूंज उठा।

सेनानी उत्तराधिकारियों ने कचहरी चौराहे स्थित सेनानी स्मारक और सप्तर्षि द्वार पर भी पुष्प अर्पित किए। इसके बाद बांसडीह डाकबंगला परिसर में स्थापित शहीद पंडित रामदहीन ओझा की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। अंत में ब्लॉक परिसर में बने सेनानी स्तंभ पर श्रद्धासुमन अर्पित कर स्वतंत्रता आंदोलन के अमर सेनानियों को नमन किया गया।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के अध्यक्ष गंगा सागर सिंह ने कहा कि 18 अगस्त का दिन बलिया और देश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। बांसडीह की धरती ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और वर्ष 1942 में यह नगर आजाद होने वाले प्रमुख स्थानों में रहा। उन्होंने कहा कि देश को आजादी ऐसे ही वीर सेनानियों के संघर्ष और बलिदान से मिली है। आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उसके पीछे हमारे सेनानियों का त्याग छिपा है।

उन्होंने कहा कि बांसडीह के प्रथम शहीद पंडित रामदहीन ओझा रहे, जबकि वर्ष 1942 में गजाधर शर्मा प्रथम तहसीलदार बने। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े इन गौरवपूर्ण अध्यायों को याद करना केवल परंपरा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को अपने इतिहास और शहीदों के बलिदान से जोड़ने का माध्यम है।
कार्यक्रम के दौरान “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम” के नारों से पूरा वातावरण देशभक्ति से सराबोर रहा। सेनानी उत्तराधिकारियों ने शहीदों के बलिदान को नमन करते हुए उनके संघर्ष और इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
इस मौके पर द्विजेंद्र कुमार मिश्र, बिनय पांडेय, बंशरोपन पांडेय, बासदेव ठाकुर, संतोष शुक्ल, डॉ. विनोद, जैनेन्द्र पांडेय मिंटू, सागर सिंह राहुल, कौशल सिंह, अभिषेक मिश्र मिंटू, मुनजी गोंड, शिवम गुप्ता और राजेश प्रजापति सहित बड़ी संख्या में सेनानी उत्तराधिकारी एवं क्षेत्रीय लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन प्रतुल कुमार ओझा ने किया।
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