18 अगस्त 1942: बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने में 19 क्रांतिकारियों ने दे दी कुर्बानी, बागी बलिया की अमर कहानी

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18 अगस्त 1942 का इतिहास: बलिया जनपद के इतिहास में 18 अगस्त 1942 की तारीख ऐतिहासिक है। नौ अगस्त से तेज हुआ आंदोलन हर दिन और भी तेज होता जा रहा था तो ब्रिटिश प्रशासन इसे छल-बल किसी भी तरह से कुचलने की हर साजिश रचने में लगा था. अंग्रेजों की दमनकारी नीति के बावजूद क्रांतिकारी बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने के अपने संकल्प से पीछे नहीं हटे। इसी संघर्ष में कई वीरों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

आजके ही दिन 18 अगस्त 1942 को बैरिया थाने पर अंग्रेजी शासन का प्रतीक उतार दिया गया और तिरंगा फहरा दिया गया. क्रांतिकारियों ने गोलियों की तड़तड़ाहट की भी परवाह नहीं की, इस संघर्ष में बड़ी संख्या में द्वाबा के वीर शहीद हुए। कुछ स्रोत 18, जबकि अन्य 19 क्रांतिकारियों के शहीद होने का उल्लेख करते हैं।

इन अमर बलिदानियों में निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, नरसिंह राय, रामजनम गोंड, रामप्रसाद उपाध्याय, मैनेजर सिंह,रामदेव कुम्हार, रामबृक्ष राय,रामनगीना सोनार, छठू कमकर, देवकी सोनार, धर्मदेव मिश्र, श्रीराम तिवारी, मुक्तिनाथ तिवारी, विक्रम सोनार, भीम अहीर सहित अनेक क्रांतिकारियों के नाम इतिहास में दर्ज हैं।

वहीं गदाधर नाथ पांडेय, गौरीशंकर राय और रामरेखा शर्मा सहित तीन अन्य क्रांतिकारियों की जेल यातना के दौरान बाद में मृत्यु होने का उल्लेख भी मिलता है।

 

बैरिया में हुई दमनकारी गोलीबारी ने क्रांतिकारियों के हौसले को तोड़ने के बजाय आंदोलन को और भी तेज कर दिया। बैरिया के बाद बलिया जिले के दूसरे हिस्सों में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनआंदोलन धधक उठा। रेलवे स्टेशनों, पटरियों और सरकारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया तथा कई स्थानों पर जनता ने अंग्रेजी प्रशासन को चुनौती दी।

 

इन अमर शहीदों की याद मे बैरिया में स्थापित शहीद स्मारक आज भी उस ऐतिहासिक संघर्ष की गवाही देता है। प्रत्येक वर्ष 18 अगस्त को यहां शहीद दिवस मनाया जाता है। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों, प्रशासनिक अधिकारियों, छात्र-छात्राओं और आम नागरिकों की ओर से शहीदों को आज भी श्रद्धांजलि दी गई।

बैरिया की 18 अगस्त की क्रांति केवल एक थाने पर तिरंगा फहराने की घटना नहीं थी, बल्कि यह उस दौर की जनशक्ति का प्रतीक थी, जब आम किसान, मजदूर, छात्र और नौजवान अंग्रेजी साम्राज्य के सामने बिना हथियारों के भी सीना तानकर खड़े हो गए थे। इन अमर शहीदों की कुर्बानी ने द्वाबा की धरती को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में विशिष्ट पहचान दिलाई।

जब 18 अगस्त का दिन आता है, तो बैरिया का शहीद स्मारक नई पीढ़ी को यही संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल हासिल नहीं की गई थी, बल्कि इसके लिए अनगिनत लोगों ने अपना वर्तमान और भविष्य देश के नाम कर दिया था।

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