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प्रेमचंद विशेष: ‘मंत्र’ प्रतिशोध से ऊपर उठकर करुणा को चुनने की कहानी है

प्रेमचंद की ‘मंत्र’ सामाजिक अन्याय से आगे मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष की कहानी है. यह प्रतिशोध के सामने करुणा, क्रोध के सामने क्षमा और शक्ति के सामने मनुष्यता को रखती है. यही नैतिक दृष्टि प्रेमचंद को केवल यथार्थवादी कथाकार नहीं, बल्कि अपने समय से आगे का मानवीय कथाकार बनाती है.
Central Desk 1 August, 2026 1 minute read
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वो कहानी जिसमें मुंशी प्रेमचंद समय से आगे निकल जाते हैं

प्रेमचंद की ‘मंत्र’ सामाजिक अन्याय से आगे मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष की कहानी है. यह प्रतिशोध के सामने करुणा, क्रोध के सामने क्षमा और शक्ति के सामने मनुष्यता को रखती है. यही नैतिक दृष्टि प्रेमचंद को केवल यथार्थवादी कथाकार नहीं, बल्कि अपने समय से आगे का मानवीय कथाकार बनाती है.

प्रेमचंद को अक्सर किसानों, मज़दूरों, दलितों और गरीबों के लेखक के रूप में याद किया जाता है. यह सच है, लेकिन पूरा सच नहीं. प्रेमचंद केवल अभाव के कथाकार नहीं हैं, वे मनुष्य के भीतर छिपी नैतिक शक्ति के भी कथाकार हैं. उनकी कई कहानियाँ सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाती हैं, लेकिन एक कहानी ऐसी है, जो सामाजिक संघर्ष से आगे बढ़कर मनुष्य की आत्मा से संवाद करती है. वह कहानी है ‘मंत्र’.

हिंदी साहित्य में कफ़न, पूस की रात, सद्गति, ठाकुर का कुआँ, ईदगाह और पंच परमेश्वर पर जितनी चर्चा हुई, ‘मंत्र’ उतनी बार केंद्र में नहीं आई. जबकि यदि प्रेमचंद के साहित्य का नैतिक दर्शन समझना हो, तो शायद सबसे पहले इसी कहानी को पढ़ा जाना चाहिए.

‘मंत्र’ हमें यह नहीं सिखाती कि समाज कैसे बदलेगा. वह इससे बड़ा प्रश्न पूछती है. मनुष्य स्वयं कब बदलेगा?

प्रेमचंद का सबसे बड़ा प्रश्न

प्रेमचंद की अधिकांश कहानियों में संघर्ष बाहर है. कहीं गरीबी है, कहीं जाति है, कहीं शोषण है, कहीं भूख है. लेकिन ‘मंत्र’ में सबसे बड़ा संघर्ष मनुष्य के भीतर चलता है.

यहीं यह कहानी अलग हो जाती है.

यह कहानी बताती है कि प्रतिशोध लेना आसान है, लेकिन अपने भीतर की आग पर विजय पाना कहीं अधिक कठिन है. प्रेमचंद इस कठिन रास्ते को चुनते हैं. वे जानते हैं कि हिंसा केवल हथियार से नहीं होती, मन के भीतर भी होती है.

आज जब समाज का बड़ा हिस्सा हर असहमति का जवाब नफ़रत से देना चाहता है, तब ‘मंत्र’ असहज करने वाली कहानी बन जाती है. वह पूछती है कि क्या बदला लेने से मनुष्य बड़ा होता है, या क्षमा करने से?

‘कफ़न’ से ‘मंत्र’ तक: प्रेमचंद की यात्रा

अगर प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों को एक साथ रखकर देखा जाए, तो एक रोचक क्रम दिखाई देता है.

‘कफ़न’ में भूख इतनी बड़ी हो जाती है कि वह मनुष्य की संवेदना तक निगल लेती है. घीसू और माधव अपनी ही दुनिया में कैद हो जाते हैं.

‘सद्गति’ में जाति व्यवस्था एक मनुष्य को जीवित रहते हुए भी मार देती है.

‘ठाकुर का कुआँ’ में सामाजिक व्यवस्था इंसान की प्यास तक पर पहरा बैठा देती है.

‘पंच परमेश्वर’ में दोस्ती से बड़ा न्याय हो जाता है.

लेकिन ‘मंत्र’ में प्रेमचंद इससे भी आगे चले जाते हैं. यहाँ वे कहते हैं कि न्याय भी तभी सार्थक है, जब उसके भीतर मनुष्यता बची रहे.

यही वह बिंदु है जहाँ प्रेमचंद केवल यथार्थवादी लेखक नहीं रहते. वे नैतिक दार्शनिक बन जाते हैं.

प्रेमचंद का असली नायक कौन है?

हम अक्सर कहते हैं कि प्रेमचंद गरीबों के लेखक हैं. शायद यह बात अधूरी है.

प्रेमचंद का नायक गरीब हो सकता है, किसान हो सकता है, बच्चा हो सकता है, स्त्री हो सकती है या कोई साधारण व्यक्ति. लेकिन उसकी सबसे बड़ी पहचान उसका वर्ग नहीं, उसकी नैतिकता है.

ईदगाह का हामिद अपनी इच्छाओं पर प्रेम को चुनता है.

पंच परमेश्वर का अलगू चौधरी दोस्ती पर न्याय को चुनता है.

और मंत्र का पात्र प्रतिशोध पर करुणा को चुनता है.

इन तीनों कहानियों का सूत्र एक ही है. प्रेमचंद के लिए महान वह नहीं है जिसके पास शक्ति है. महान वह है, जो शक्ति होते हुए भी मनुष्यता नहीं छोड़ता.

यही प्रेमचंद को उनके समकालीनों से अलग बनाता है

बीसवीं सदी के आरंभिक हिंदी साहित्य में सामाजिक सुधार का स्वर प्रबल था. बहुत से लेखकों ने अन्याय, रूढ़ियों और कुरीतियों पर लिखा. लेकिन प्रेमचंद की विशिष्टता यह है कि वे केवल व्यवस्था को नहीं बदलना चाहते, वे मनुष्य की चेतना को बदलना चाहते हैं.

उनकी कहानियों में क्रांति तलवार से नहीं आती, चरित्र से आती है.

‘मंत्र’ इसी विचार का सबसे सशक्त उदाहरण है.

आज राजनीति, समाज और यहाँ तक कि पारिवारिक जीवन में भी प्रतिशोध की संस्कृति बढ़ती दिखाई देती है. ऐसे समय में प्रेमचंद का यह कहना कि करुणा कमजोरी नहीं, बल्कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है, अत्यंत आधुनिक विचार लगता है.

यही कारण है कि ‘मंत्र’ आज भी पुरानी नहीं लगती.

एक स्त्री की नज़र से ‘मंत्र’

एक स्त्री जब ‘मंत्र’ पढ़ती है, तो कहानी का अर्थ और व्यापक हो जाता है.

सभ्यता के लंबे इतिहास में पुरुषों के हिस्से युद्ध, विजय और सत्ता की कहानियाँ अधिक लिखी गईं. स्त्रियों के हिस्से परिवार, संबंध, देखभाल और जीवन को बचाए रखने की जिम्मेदारियाँ आईं. यह विभाजन उचित था या नहीं, यह अलग बहस है, लेकिन इससे एक अनुभव अवश्य जन्मा. वह अनुभव है, टूटे हुए को जोड़ने का.

‘मंत्र’ इसी जोड़ने की संस्कृति की कहानी है.

प्रेमचंद करुणा को स्त्री का गुण नहीं कहते. वे उसे मनुष्य का सर्वोच्च गुण बना देते हैं. यही उनकी सबसे बड़ी आधुनिकता है.

आज जब स्त्री विमर्श बराबरी की बात करता है, तब ‘मंत्र’ हमें यह भी याद दिलाती है कि बराबरी केवल अधिकारों की नहीं होती, बल्कि संवेदनाओं की भी होती है. यदि समाज करुणा को कमजोरी मानने लगे, तो सबसे पहले मनुष्यता हारती है.

प्रेमचंद का सबसे बड़ा ‘मंत्र’

प्रेमचंद का साहित्य पढ़ते हुए लगता है कि वे किसी धार्मिक अनुष्ठान का मंत्र नहीं दे रहे थे.

उनका मंत्र था, मनुष्य बने रहो.

व्यवस्था बदलने में समय लगता है. कानून बदलने में भी समय लगता है. लेकिन मनुष्य अपने भीतर का निर्णय एक क्षण में बदल सकता है. प्रेमचंद इसी आंतरिक परिवर्तन पर विश्वास करते थे.

शायद यही कारण है कि उनकी कहानियाँ केवल अपने समय की नहीं रहीं. वे हर उस समय की कहानियाँ बन गईं, जब समाज घृणा और करुणा के बीच खड़ा होता है.

‘मंत्र’ इसलिए केवल एक कहानी नहीं है. यह प्रेमचंद की नैतिक दृष्टि का घोषणापत्र है. यह बताती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय किसी दूसरे पर नहीं, स्वयं पर होती है.

और संभवतः यही कारण है कि प्रेमचंद हिंदी के केवल सबसे बड़े यथार्थवादी कथाकार नहीं, बल्कि सबसे बड़े मानवीय कथाकार भी हैं. उनके पात्र हमें समाज बदलने से पहले स्वयं को देखने की सीख देते हैं. आज, जब संवाद की जगह शोर और असहमति की जगह वैमनस्य बढ़ता जा रहा है, तब ‘मंत्र’ पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक होकर हमारे सामने खड़ी है.

प्रेमचंद ने अपने साहित्य से अनेक संदेश दिए, लेकिन यदि उनकी समूची रचना-यात्रा को एक वाक्य में समेटना हो, तो वह शायद यही होगा कि मनुष्य की असली पहचान उसकी शक्ति, संपत्ति या विजय नहीं, बल्कि उसकी करुणा है. यही ‘मंत्र’ है. यही प्रेमचंद हैं.

रंजना आर त्रिपाठी (बलिया में जन्म, पढ़ाई लिखाई और बनारस में निवास है.)

[AI assistance was used in the writing/editing or creating image of this article.]

Tags: मंत्र मुंशी प्रेमचंद साहित्य

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