सार्वजनिक जगहों पर मोबाइल का शोर: आखिर दूसरों की शांति का भी कोई अधिकार है?
दक्षिण रेलवे की पहल पूरे देश में लागू होनी चाहिए. सार्वजनिक जगहों पर तेज आवाज में मोबाइल चलाना सिर्फ बदतमीजी नहीं, दूसरों की सुविधा और अधिकारों की अनदेखी भी है.
आपके मोबाइल में क्या चल रहा है, यह आपकी निजी पसंद है. लेकिन पूरी बोगी को अपने मोबाइल का लाउडस्पीकर समझ लेना कौन-सा नागरिक अधिकार है?
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ट्रेन हो, बस हो या अस्पताल, कुछ लोग मोबाइल पर तेज आवाज में रील, गाने और फिल्में चलाते हैं, मानो आसपास मौजूद बाकी लोग भी उनकी पसंद सुनने के लिए ही बैठे हों. उन्हें अपनी सुविधा का ख्याल रहता है, लेकिन दूसरों की परेशानी का नहीं. यह सिर्फ शोर की समस्या नहीं, नागरिक अनुशासन और दूसरों के अधिकारों के प्रति उदासीनता का मामला है.
दक्षिण रेलवे ने इस समस्या के खिलाफ सख्ती की पहल की है. यह स्वागतयोग्य कदम है. लेकिन जब समस्या पूरे देश में है, तो समाधान सिर्फ दक्षिण रेलवे तक सीमित क्यों रहे? इसे पूरे भारतीय रेलवे और दूसरे सार्वजनिक स्थलों पर भी लागू किया जाना चाहिए.
वंदे भारत की एग्जिक्यूटिव क्लास में मेरा अनुभव
करीब दो-तीन साल पहले मैं बनारस से वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार होकर दिल्ली लौट रहा था. एग्जिक्यूटिव क्लास में सफर था. सब कुछ सामान्य चल रहा था. फिर रास्ते में एक स्टेशन पर एक यात्री आया और हमारी बोगी में बैठ गया.
कुछ ही देर बाद उसने मोबाइल पर तेज आवाज में बात करना शुरू कर दिया. बातचीत खत्म हुई, तो लगा कि अब शांति होगी. लेकिन उसने फोन के स्पीकर पर रील, गाने और फिल्मों के वीडियो चलाने शुरू कर दिए. मोबाइल का वॉल्यूम जितना तेज हो सकता था, वह उतनी ही तेज आवाज में सब कुछ सुन रहा था.
किसी ने उसे टोका नहीं. हम भी चुपचाप बैठे रहे. मेरे पास हेडफोन था. मैं कुछ सुनना चाहता हूं, तो दूसरों को परेशान करने के बजाय हेडफोन लगाता हूं. उस दिन भी उस यात्री के शोर से बचने के लिए मुझे हेडफोन पहनना पड़ा. शोर कोई और कर रहा था और उससे बचने के लिए मुझे अपने कानों पर हेडफोन लगाना पड़ा.
फिर अगले स्टेशन पर एक और यात्री आया. वह सीधे उसी यात्री के बगल वाली सीट पर आकर बैठ गया, जो पहले से तेज आवाज में मोबाइल चला रहा था. उसने भी कुछ देर बैठने के बाद अपने मोबाइल का स्पीकर खोल दिया. अब दोनों अगल-बगल बैठे अपने-अपने फोन पर रील, गाने और वीडियो देखने लगे. दोनों के मोबाइल से आवाज आ रही थी, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि दोनों में से किसी को भी दूसरे के शोर से कोई परेशानी नहीं थी.
पहला यात्री दूसरे की आवाज से परेशान नहीं था और दूसरे को पहले वाले से कोई शिकायत नहीं थी. दोनों अपनी-अपनी दुनिया में मस्त थे. लेकिन आसपास बैठे बाकी लोगों को उनकी मनमानी झेलनी पड़ रही थी.
यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है. कुछ लोगों को खुद शोर से फर्क नहीं पड़ता, इसलिए वे मान लेते हैं कि दूसरों को भी परेशानी नहीं होगी. उन्हें यह ख्याल नहीं आता कि आसपास बच्चे, बुजुर्ग या ऐसे लोग भी हो सकते हैं, जिन्हें आराम करना हो या अपने काम पर ध्यान देना हो. हर किसी को अपनी सुविधा के लिए हेडफोन लगाने या दूसरे का शोर सहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.
एग्जिक्यूटिव क्लास का ज्यादा किराया देने के पीछे बेहतर और आरामदायक यात्रा की उम्मीद भी होती है. लेकिन महंगा टिकट भी यह गारंटी नहीं देता कि सहयात्रियों में नागरिक अनुशासन होगा. हालांकि, शांति का अधिकार सिर्फ एग्जिक्यूटिव क्लास के यात्रियों का नहीं है. हर श्रेणी में सफर करने वाले को दूसरों की सुविधा का सम्मान करना चाहिए.
हमारी यात्रा दिल्ली तक की थी. उन दोनों में से एक यात्री बीच रास्ते में कहीं उतर गया. स्टेशन का नाम अब याद नहीं है. उसके उतरने से कुछ शांति मिली. लेकिन सवाल मन में रह गया कि दूसरों को परेशान न करने जैसी सामान्य बात समझाने के लिए भी नियमों और कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ती है?
इसके बाद भी ट्रेन, अस्पताल और दूसरे सार्वजनिक स्थलों पर ऐसा व्यवहार देखने को मिलता रहा है. यह किसी एक यात्री या एक यात्रा की समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में दूसरों की सुविधा के प्रति बढ़ती उदासीनता का उदाहरण है.
नियम सिर्फ दक्षिण रेलवे में क्यों?
दक्षिण रेलवे ने ट्रेनों और रेलवे परिसरों में मोबाइल के स्पीकर पर तेज आवाज में संगीत या वीडियो चलाने और दूसरों को परेशान करने वाली ऊंची आवाज में बातचीत के खिलाफ सख्ती की पहल की है. खबरों में रेलवे अधिनियम की धारा 145 के तहत 5,000 रुपये तक के जुर्माने और छह महीने तक की जेल का उल्लेख किया गया है.
यह अधिकतम सजा हर मामले में अपने आप लागू नहीं होती. कार्रवाई संबंधित कानूनी प्रावधानों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है. फिर भी, इस पहल का संदेश स्पष्ट है. सार्वजनिक जगहों पर दूसरों को परेशान करने वाले व्यवहार को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए.
जब यह समस्या पूरे देश में है, तो उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम के बीच फर्क क्यों हो? रेलवे के सभी जोन में स्पष्ट नियम और उनका समान रूप से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
अस्पतालों और दूसरे सार्वजनिक स्थलों पर भी हो सख्ती
अस्पतालों में भी लोग मोबाइल पर तेज आवाज में वीडियो चलाते या ऊंची आवाज में बात करते दिख जाते हैं. वहां मरीज दर्द, बीमारी और तनाव से गुजर रहे होते हैं. ऐसे में अनावश्यक शोर उनकी परेशानी बढ़ा सकता है.
बसों, मेट्रो, पुस्तकालयों, सरकारी कार्यालयों और प्रतीक्षालयों में भी यही समस्या है. किसी व्यक्ति को मनोरंजन करना है या फोन पर बात करनी है, इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. लेकिन अपनी सुविधा के लिए दूसरों को शोर सुनने के लिए मजबूर करना कहां तक उचित है?
कई बार कोई टोक दे, तो लोग थोड़ी देर के लिए शांत हो जाते हैं. सुरक्षा गार्ड या कर्मचारी के हटते ही फिर वही हरकत शुरू हो जाती है. इससे साफ है कि समस्या केवल नियमों की नहीं, बल्कि उनके प्रति सम्मान की भी है.
नियम भी जरूरी, नागरिक समझ भी
दक्षिण रेलवे की पहल पूरे भारतीय रेलवे में लागू होनी चाहिए. बसों, मेट्रो, अस्पतालों और दूसरे सार्वजनिक स्थलों पर भी उनकी जरूरत के मुताबिक स्पष्ट नियम बनाए जाएं.
मोबाइल पर वीडियो या गाने सुनने के लिए हेडफोन का इस्तेमाल किया जाए और फोन पर बातचीत धीमी आवाज में हो. पहली बार गलती करने वालों को चेतावनी दी जा सकती है, लेकिन बार-बार नियम तोड़ने वालों पर उचित कार्रवाई होनी चाहिए. शिकायत दर्ज कराने की आसान व्यवस्था भी जरूरी है.
हालांकि, सबसे बड़ा बदलाव नागरिकों की सोच से आएगा. हर समय सुरक्षा गार्ड की मौजूदगी में ही अनुशासित रहना पर्याप्त नहीं है. लोगों को खुद समझना होगा कि सार्वजनिक जगह कोई निजी बैठकखाना नहीं है.
दक्षिण रेलवे ने एक जरूरी पहल की है. अब इसे पूरे देश में आगे बढ़ाने की जरूरत है. सभ्य समाज की पहचान सिर्फ तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि इस बात से भी होती है कि उसके नागरिक दूसरों की सुविधा और अधिकारों का कितना सम्मान करते हैं.
मोबाइल पर क्या देखना है, यह आपकी पसंद है. लेकिन उसकी आवाज दूसरों को सुनने के लिए मजबूर करना आपकी आजादी नहीं, दूसरों की आजादी में दखल है.
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