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आईएएस अधिकारी के पद से इस्तीफा देकर ‘जन नीति भारत’ पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने के दिव्या मित्तल के ऐलान से यूपी की सियासत में नई चर्चाएं छिड़ गई हैं. पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल की राजनीति में एंट्री ऐसे समय में हुई है, जब देश में जेन-जी आंदोलन और युवाओं की राजनीतिक भागीदारी को लेकर माहौल गर्म है. मिर्जापुर, संतकबीर नगर और देवरिया की जिलाधिकारी रह चुकीं दिव्या ने एलीट सरकारी नौकरी छोड़कर उतार-चढ़ाव से भरी राजनीति में कदम रखा है. इस पहल ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए चेहरे और नए प्रयोग की संभावना को जगह दी है.
दिव्या मित्तल की राजनीति में एंट्री की तुलना अरविंद केजरीवाल से होना स्वाभाविक है. दोनों IIT पासआउट हैं. दोनों ने नौकरशाही का रास्ता छोड़कर राजनीति में आने का फैसला किया. हालांकि, एक बड़ा अंतर भी है. दिव्या IAS अधिकारी रही हैं, जबकि केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा यानी IRS के अधिकारी थे. दोनों की राजनीतिक परिस्थितियां और काम करने के तरीके भी अलग हैं. तीन जिलों में DM रह चुकीं दिव्या का आमजन से सीधा जुड़ा रहा है, जबकि केजरीवाल परदे के पीछे से काम करने वाले आयकर विभाग में थे.
केजरीवाल से कितनी अलग हैं दिव्या?
अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से मिली लोकप्रियता को राजनीतिक ताकत में बदला. जन लोकपाल आंदोलन उनकी राजनीति का प्रमुख आधार बना. उन्होंने सादगी, ईमानदारी और आम आदमी के लिए काम करने की छवि गढ़ी. दिल्ली में उनकी सरकार के कई कामों की सराहना भी हुई.
लेकिन समय के साथ उनकी राजनीति विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरती चली गई. उन्हें और उनके कई करीबी नेताओं को जेल भी जाना पड़ा. 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी 12 साल पहले बनी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई.
यह अनुभव बताता है कि आंदोलन से मिली अपार लोकप्रियता और चुनावी राजनीति में लंबे समय तक भरोसा बनाए रखना दो अलग बातें हैं. दिव्या मित्तल भी जनहित और लोगों के कल्याण से जुड़े मुद्दों को उठा रही हैं, लेकिन उनकी शैली केजरीवाल से अलग है. वह जनता से सीधे जुड़े अपने प्रशासनिक अनुभव और जिलों में किए कामों को अपनी राजनीतिक पहचान का आधार बना रही हैं.
प्रशांत किशोर से भी होगी तुलना
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की राजनीतिक पहल जन सुराज की भी चर्चा हुई थी. माहिर चुनावी रणनीतिकार PK ने अपनी पहचान को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश की, लेकिन बड़बोले दावों के बीच पहली कोशिश में उनकी पार्टी को चुनाव में मुंह की खानी पड़ी. वैसे बांकीपुर के उपचुनाव में मिली रणनीतिक जीत, उनके लिए नई उम्मीद भी जताती है.
PK मोटी फीस लेकर नेताओं के चुनावी अभियानों की रणनीति बनाने के लिए जाने गए, जबकि दिव्या सरकार के भीतर रहकर सरकारी व्यवस्था और स्थानीय समस्याओं को करीब से जानती हैं. हालांकि दोनों के सामने, एक साझा चुनौती है. व्यक्तिगत पहचान को स्थायी राजनीतिक संगठन और जनसमर्थन में बदलना.
लोकप्रियता पहले से, लेकिन आगे की राह कठिन
दिव्या मित्तल की एक खासियत यह है कि मिर्जापुर में उनकी पहचान राजनीति में आने की घोषणा से पहले ही बन चुकी थी. जिलाधिकारी रहते हुए उन्होंने लहुरिया दह गांव तक पाइप से पानी पहुंचाने की पहल की थी. इस काम ने उन्हें स्थानीय स्तर पर पहचान दिलाई.
उनकी शैक्षणिक और पेशेवर पृष्ठभूमि भी उल्लेखनीय है. IIT से इंजीनियरिंग और IIM बेंगलुरु से MBA करने के बाद उन्होंने लंदन में नौकरी की. इसके बाद उन्होंने सिविल सेवा चुनी और IAS बनीं. अब प्रशासनिक सेवा को अलविदा कह राजनीति में उतर आई हैं.
हालांकि, प्रशासनिक उपलब्धियों को सीधे चुनावी सफलता की गारंटी नहीं माना जा सकता. किसी अधिकारी के काम में व्यक्तिगत प्रयास के साथ सरकारी संसाधनों, प्रशासनिक तंत्र और स्थानीय परिस्थितियों की भी भूमिका होती है. राजनीति में संगठन खड़ा करना, कार्यकर्ताओं को जोड़ना, जनता के बीच लगातार बने रहना और वादों पर जवाबदेह होना जैसी अलग तरह की चुनौतियां हैं.
यूपी की राजनीति में कितनी जगह?
अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की सत्ता को चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत विपक्षी दल अपनी रणनीति बनाएंगे. ऐसे में दिव्या के सामने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की चुनौती होगी.
कुछ मीडिया रिपोर्टों में उनके मिर्जापुर सदर सीट से चुनाव लड़ने की संभावना जताई गई है. हालांकि, उनकी उम्मीदवारी की स्पष्ट घोषणा की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. मिर्जापुर में उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता शुरुआती आधार बन सकती है, लेकिन चुनाव में स्थानीय समीकरण, संगठन की मजबूती और मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी महत्वपूर्ण होंगी. जनता के बीच पहचान और सोशल मीडिया पर समर्थन को सीधे वोटों में बदलकर नहीं देखा जा सकता.
उम्मीदों का आधार, लेकिन परीक्षा राजनीति की
दिव्या मित्तल की कहानी को केजरीवाल या प्रशांत किशोर की राजनीति का दोहराव मान लेना जल्दबाजी होगी. उनकी अपनी पृष्ठभूमि, अनुभव और कार्यशैली है. वह प्रशासनिक मशीनरी को भीतर से जानती हैं और जनसमस्याओं से सीधे जुड़कर काम कर चुकी हैं.
फिर भी राजनीति में सफलता के लिए सिर्फ अच्छा प्रशासक होना पर्याप्त नहीं है. लोगों को साथ जोड़ना, असहमति का सामना करना, संगठन खड़ा करना और लगातार जनता के बीच बने रहना भी जरूरी है.
दिव्या मित्तल के पास प्रशासनिक अनुभव है, अपनी पहचान है और जनहित के मुद्दों को उठाने का अवसर है. अब देखना यह होगा कि वह इन खूबियों को राजनीतिक ताकत में कैसे बदलती हैं. जब तक खुद का ब्रांड नहीं बनातीं, उनकी तुलना AK और PK से होती रहेगी. दिव्या की राजनीति का भविष्य उनके अपने फैसलों, संगठन और जनता के बीच काम से तय होगा.
जननीति भारत के तीन वचन, जनता होगी केंद्र में
दिव्या मित्तल की नई पार्टी जननीति भारत तीन वचनों के साथ अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है. पहला, जन से नीति, नीति से भारत, यानी नीतियां जनता की जरूरतों और भागीदारी से तय हों. दूसरा, जरूरत के हिसाब से फैसला, यानी फैसलों का आधार जनहित हो. तीसरा, जनता को हर काम का हिसाब, यानी सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो. इन वचनों के जरिए दिव्या मित्तल ने जनता की भागीदारी, समानता और जवाबदेह शासन को अपनी राजनीति के केंद्र में रखने का संदेश दिया है.
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