10 अगस्त को छात्रों के सड़कों पर उतरने के बाद 11 अगस्त 1942 को बलिया में स्वतंत्रता आंदोलन ने और बड़ा रूप ले लिया. इस दिन आयोजित जुलूस में जनपद के करीब 20 हजार लोगों ने हिस्सा लिया. अब यह आंदोलन सिर्फ बलिया शहर तक सीमित नहीं था. इसकी लहर गांवों और कस्बों तक पहुंचने लगी थी.
सुबह बलिया शहर के ओक्डेनगंज इलाके में विश्वनाथ मर्दाना के नेतृत्व में हजारों लोगों का बड़ा जुलूस निकला. आजादी के नारों से माहौल गूंज उठा. जुलूस के बाद हुई सभा में स्वतंत्रता आंदोलन के अगुवा रामअनंत पांडेय ने लोगों को भारत छोड़ो आंदोलन के उद्देश्य और उसके कार्यक्रमों के बारे में बताया.
रामअनंत पांडेय ने लोगों से अंग्रेजी शासन का विरोध करने की अपील की. उन्होंने अदालतों के बहिष्कार का आह्वान किया और कहा कि सभी बाजार और दुकानें बंद रखी जाएं. उनके भाषण से आंदोलन को आगे बढ़ाने का संदेश साफ तौर पर जनता तक पहुंचा.
लेकिन सभा के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला. भाषण देने के बाद पं. रामअनंत पांडेय को गिरफ्तार कर लिया गया. आंदोलन के एक प्रमुख नेता की गिरफ्तारी के बावजूद लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ. बल्कि बलिया में आंदोलन और तेजी से फैलने लगा.
बलिया शहर से बाहर भी इसका असर दिखाई देने लगा था. बिल्थरारोड में पारसनाथ मिश्र के नेतृत्व में उग्र प्रदर्शन हुए. इन प्रदर्शनों के दौरान सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. आंदोलन अब अलग-अलग इलाकों में स्थानीय नेतृत्व के साथ अपने-अपने तरीके से आगे बढ़ रहा था.
11 अगस्त को रानीगंज, बिल्थरारोड और खेजूरी जैसे इलाकों में भी स्वतंत्रता के समर्थन में जुलूस निकाले गए. इन जुलूसों में ग्रामीणों ने निर्भय होकर हिस्सा लिया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जमकर नारे लगाए.
इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ रही थी. जानकी देवी, कल्याणी देवी और पार्वती देवी के नाम इस दौर की सक्रिय महिला सहभागिता के प्रमुख उदाहरणों के तौर पर सामने आते हैं.
11 अगस्त का दिन इसलिए महत्वपूर्ण था कि बलिया की आजादी की लड़ाई अब किसी एक जगह या एक समूह की लड़ाई नहीं रह गई थी. शहर से लेकर कस्बों और गांवों तक लोग अपने-अपने स्तर पर आंदोलन में शामिल हो रहे थे.
10 अगस्त को जिस आंदोलन ने छात्रों के जरिए रफ्तार पकड़ी थी, 11 अगस्त को उसने जनआंदोलन का रूप लेना शुरू कर दिया. नेताओं की गिरफ्तारी भी लोगों को रोक नहीं सकी. बलिया में अब क्रांति की लहर फैल चुकी थी और उसकी गूंज शहर से निकलकर गांवों तक पहुंच गई थी.
कृष्णकांत पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

