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आजादी के आंदोलन में 12 अगस्त 1942 का दिन बलिया के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस दिन छात्रों ने अदालतों का काम बंद कराने के लिए जुलूस निकाला. जवाब में पुलिस ने दमनकारी रवैया अपनाया, लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां कीं, लेकिन आंदोलन नहीं रुका. इसी दिन लालगंज में 14 अगस्त को बैरिया थाने पर कब्जे का एलान हुआ, जिससे आंदोलन का तेवर और उग्र हुआ.
दरअसल यह वह समय था जब सन 1942 में महात्मा गांधी और उनके सहयोगियों की गिरफ्तारी के बाद भारत छोड़ो आंदोलन की लहर बलिया तक पहुंच चुकी थी. युवा और छात्र अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुट गए थे. छात्रों में कांग्रेसी, समाजवादी और क्रांतिकारी विचारों से जुड़े लोग शामिल थे.
आंदोलन 11 अगस्त तक बलिया की सड़कों तक पहुंच चुका था. स्कूल बंद हो चुके थे, छात्र जुलूस निकाल रहे थे और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आने लगा था. 12 अगस्त 1942 को बलिया शहर में छात्रों ने जुलूस निकाला. इस बार बात सिर्फ विरोध प्रदर्शन की नहीं थी. छात्र अंग्रेजी शासन की अदालतों का काम बंद कराना चाहते थे. जुलूस कचहरी की ओर बढ़ रहा था.
प्रशासन ने जुलूस को रोकने के लिए करीब 100 सशस्त्र कांस्टेबल तैनात किए. छात्रों और पुलिस के बीच टकराव हुआ और पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया. इसमें कई क्रांतिकारी बुरी तरह घायल हुए, लेकिन लहूलुहान क्रांतिवीर छात्रों का जुलूस रुका नहीं.
इस आंदोलन में पारस नाथ मिश्र मिश्रौली, केदारनाथ सिंह गोपालपुर, उमा दत्त सिंह, हरिहर सिंह, जमुना और कैलाशपति राय टुटुआरी जैसे लोग प्रमुख रूप से शामिल थे. आंदोलनकारियों ने संचार व्यवस्था को भी छिन्न-भिन्न कर दिया.
रात में पुलिस ने करीब 30 छात्रों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इसके बाद छात्रों के घरों पर छापेमारी शुरू हुई. छात्रों की पिटाई की गई. पुलिस कार्रवाई के विरोध में महिलाएं भी घरों से बाहर निकल आईं. श्रीमती जानकी देवी के नेतृत्व में महिलाओं का जुलूस सिविल जज के पास पहुंचा. महिलाओं ने जज से जुलूस में शामिल होने को कहा. जज ने असमर्थता जताई तो महिलाओं ने अपनी चूड़ियां उतारकर उन्हें पहनने के लिए दे दीं.
इसके बाद जज कुर्सी छोड़कर वहां से चले गए. महिलाओं ने जजी कचहरी पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया, लेकिन 12 अगस्त की घटनाएं सिर्फ बलिया शहर तक सीमित नहीं थीं. इसी दिन लालगंज इलाके में सुराजियों ने सार्वजनिक रूप से एलान किया कि 14 अगस्त को बैरिया थाने पर कब्जा किया जाएगा.
यह एलान आंदोलन के बदलते तेवर का संकेत था. आंदोलन अब सरकारी संस्थानों के बहिष्कार और जुलूसों से आगे बढ़कर अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक ढांचे को सीधे चुनौती देने की दिशा में बढ़ रहा था. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 12 अगस्त को लालगंज और 13 अगस्त को दोकटी में बैरिया थाने पर कब्जे का एलान किया गया था.
इसी बीच ब्रिटिश संसद में भारत सचिव ने भारत में चल रहे आंदोलन पर बयान दिया. उन्होंने कांग्रेस के कार्यक्रम को प्रशासन और अदालतों को पंगु बनाने, टेलीग्राफ और टेलीफोन की तारें काटने और सेना में भर्ती के बहिष्कार जैसी कार्रवाइयों से जोड़ा.
बलिया में इसका असर आंदोलन को रोकने के बजाय उसे और उग्र करने के रूप में सामने आया. अगले ही दिन, 13 अगस्त को बिल्थरारोड रेलवे स्टेशन को निशाना बनाया गया. स्टेशन की तिजोरियों में मिले नोट लूटे नहीं गए, बल्कि जला दिए गए. पानी की टंकी और पंप तोड़े गए. रेलवे की दूसरी संपत्तियों, पुलिस थानों, डाकखानों और सरकारी प्रतिष्ठानों पर भी हमले शुरू हो गए.
लालगंज में 12 अगस्त को जिस बैरिया थाने पर कब्जे का एलान हुआ था, उसकी अगली कड़ी 14 अगस्त को सामने आई. द्वाबा क्षेत्र के लोग बैरिया की ओर बढ़े. आगे की घटनाओं में तिरंगा, थाने पर कब्जे की कोशिश और अंग्रेजी पुलिस की गोलियां एक साथ दर्ज हुईं. इस तरह 12 अगस्त 1942 बलिया के भारत छोड़ो आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया. एक तरफ छात्र अंग्रेजी अदालतों को चुनौती दे रहे थे, तो दूसरी तरफ लालगंज में बैरिया थाने पर कब्जे की तैयारी का एलान हो चुका था. बलिया में आंदोलन अब सिर्फ विरोध तक सीमित नहीं था. अंग्रेजी शासन को सीधे चुनौती देने की तैयारी शुरू हो चुकी थी.
कृष्णकांत पाठक, वरिष्ठ पत्रकार
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