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2 फरवरी, आर्द्र भूमि संरक्षण दिवस पर विशेष- बलिया के लिए किडनी एवं धमनी की तरह काम करती हैं आर्द्र – भूमियां (वेटलैंड्स)  

आर्द्र- भूमियां किसी भी क्षेत्र की जैवविविधता, पारिस्थितिकी एवं भू-गर्भ जल को सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित ढंग से दीर्घ काल तक बनाए रखते हुए मानव के लिए न केवल जल उपलब्ध करातीं हैं, बल्कि आहार को भी उपलब्ध कराती हैं
Central Desk 2 February, 2024 1 minute read
Boating stopped in Surha Tal, bird sanctuary waiting for tourism development; Plans are on hold
2 फरवरी, आर्द्र भूमि संरक्षण दिवस पर विशेष- बलिया के लिए किडनी एवं धमनी की तरह काम करती हैं आर्द्र – भूमियां (वेटलैंड्स)  

 

बलिया. पर्यावरणविद् डा. गणेश पाठक ने एक भेंटवार्ता में बताया कि आर्द्र- भूमियां किसी भी क्षेत्र की जैवविविधता, पारिस्थितिकी एवं भू-गर्भ जल को सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित ढंग से दीर्घ काल तक बनाए रखते हुए मानव के लिए न केवल जल उपलब्ध करातीं हैं, बल्कि आहार को भी उपलब्ध कराती हैं  एवं अन्य जीव जंतुओं के लिए भी जीवन का आधार बनती हैं.

आर्द्र भूमि वह भूमि होती है,जहां वर्ष में 8 माह जल भरा रहता है. इस तरह जल से संतृप्त भू-भाग को ही आर्द्र – भूमि कहा जाता है. इस प्रकार आर्द्र- भूमि वह भूमि होती है,जहां जल, पर्यावरण एवं इससे जुड़े पौधे तथा वन्य- जीव को नियंत्रित करने के प्राथमिक कारक होते हैं. वर्तमान समय में आर्द्र- भूमियों को विशिष्ट पारिस्थितिकीय विशेषताओं, कार्यों एवं मूल्यों के साथ अलग पारिस्थितिकी प्रणालियां माना जाने लगा है. इस प्रकार आर्द्र- भूमियां प्राकृतिक एवं मानव निर्मित मीठे या खारा जल वाली अनेक पारिस्थितिकी सेवाएं प्रदान करती हैं. पक्षियों का घनत्व विशेष रूप से किसी आर्द्र भूमि की पारिस्थितिकी का वास्तविक संकेत होता है.

डा. पाठक ने बताया कि जहां तक बलिया जिला में आर्द्र- भूमियों की बात है तो बलिया जनपद आर्द्र- भूमि की दृष्टि से अत्यन्त धनी क्षेत्र है.

बलिया जनपद की भौगोलिक स्थिति है कि यह जनपद तीन तरफ से गंगा,सरयू एवं तमसा( छोटी सरयू) नदियों से घिरा हुआ है. ये नदियां प्राचीन काल से वर्तमान समय तक अपने प्रवाह मार्ग को परावर्तित करती रही हैं, जिसके चलते इन नदियों द्वारा झाड़न के रूप में छोटे – बड़े ताल – तलैयों का निर्माण होता रहा है. भौगोलिक भाषा में इन्हें गोखुर झील अर्थात् गाय के खुर के आकार का झील भी कहा जाता है. ‘सुरहा ताल’ इसका उत्तम उदाहरण है.

भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा जारी बलिया ज़िला के ‘भूपत्रक’ के अध्ययन के अनुसार इस जिला में 88 से अधिक आर्द्र- भूमि हैं,जिनमें से लगभग 40 आर्द्र- भूमियों की पहचान कर ली गयी है. इन 40 आर्द्र भूमियों में से भी 28 इर्द- भूमि विशेष रूप से चिन्हित हैं। इन आर्द्र – भूमियों में से सुरहा ताल, दह मुड़ियारी एवं रेवती दह मुख्य हैं.ये सभी आर्द्र – भूमियां बलिया जिला के लिए किडनी एवं धमनियों की तरह काम करती हैं.

जिस तरह किडनी शरीर के खून को साफ कर धमनियों के माध्यम से पूरे शरीर में स्वच्छ खून का संचार करती हैं, उसी तरह ये आर्द्र-भूमियां बलिया ज़िला के भू-गर्भ जल को स्वच्छ कर हमें पीने हेतु स्वच्छ जल उपलब्ध करातीं हैं,साथ ही साथ भू-गर्भ जल संभरण कर दीर्घ काल तक सुरक्षित भी रखती हैं. बलिया जिला इस मायने में भाग्यशाली हैं.

डा०पाठक के अनुसार बलिया ज़िला में स्थित आर्द्र – भूमियां बलिया जिले की जैवविविधता को भी समृद्धि प्रदान कर पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को भी सुरक्षित एवं संरक्षित रखती हैं. ये आर्द्र- भूमियां जलीय उत्पादों खासतौर से मछली, धान, सिंघाड़ा, कमल ककड़ी,कमलगट्टा,बेरा,भसेड़ आदि उत्पादों को प्रदान कर हमें आहार भी प्रदान करती हैं. इनमें उत्पन्न अनेक प्रकार की वनस्पतियों द्वारा जल का शोधन भी होता है एवं जल प्रदूषित होने से भी बचता है. पशुओं के लिए भी इन आर्द्र- भूमियों से आहार प्राप्त होता है.

डा.पाठक के अनुसार बलिया ज़िला में चिन्हित आर्द्र- भूमियों में सुरहा ताल, दह मुड़ियारी, रेवती दह, गड़हा,इटौरा, खालिस, गोन्हिया, दुल्लहपुर , पाण्डेयपुर, मोतिरा, नगरा, सवन, सुहेला, पकरी, मदारी, लखुनिया, बरका, बहेरी, टेंगरही, टेंगरहा, कोल,संसारटोला,कोड़हरा,लहसनी यमुना, चंदवक, बरौली, जमालपुर, खामपुर, चरौंवा, कैथौली, हरवंशपुर, मुस्तफाबाद, नसीरपुर एवं दौलतपुर मुख्य हैं.

इसके अलावा कटहल(कष्टहर ) नाला एवं कोल नाला दो ऐसे प्राकृतिक नाला हैं,जिनमें वर्ष भर जल रहता है और ये नाले बलिया की आर्द्र-भूमियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.साथ ही साथ अन्य भी ऐसे नाले हैं,जिनमें से कुछ ऋत्विक हैं एवं कुछ सतत प्रवाही हैं,जो आर्द्र- भूमि के रूप में काम करते हैं.

खासतौर से सुरहा ताल के सन्दर्भ में डा. पाठक ने कहा कि सुरहा ताल न केवल बलिया का, बल्कि उत्तर-प्रदेश का एक बड़ा ताल माना जाता हैं. सुरहा ताल गंगा नदी के मार्ग परिवर्तन के कारण निर्मित एक गोखुर झील है, जिसका उद्धार नेपाल नरेश राजा ‘सुरथ’ द्वारा कराया गया था, जिनके नाम पर इसका नाम ‘ सुरथ ताल’ पड़ा,जो कालान्तर में अपभ्रंश होकर ‘सुरथा ताल’ हो गया एवं पुनः बाद में अपभ्रंश होकर ‘सुरहा ताल’ हो गया.

सुरहा ताल का औसत क्षेत्रफल 24.6 वर्ग किमी० है, किंतु बरसात के दिनों में इसका विस्तार 34.2 वर्ग किमी०क्षेत्र में हो जाता है. ग्रीष्म काल में जल में कमी हो जाने के कारण इसका क्षेत्रफल घटकर 21 वर्ग किमी० रह जाता है. वर्तमान समय में इस ताल के क्षेत्रफल में निरन्तर कमी होती जा रही है, जिसका मुख्य कारण इस ताल की तलहटी में गाद का जमाव होना एवं अतिक्रमण का होना है. सुरहा ताल अपने – आपमें अनेक विशेषताओं को समेटे हुए है.

यह एक ऐसा ताल है,जिसमें वर्ष भर जल रहता है. आर्द्र- भूमि पारिस्थितिकी की जितनी भी विशेषताएं होती हैं,वो सभी विशेषताएं सुरहा ताल में पायी जाती हैं. सुरहा ताल में न केवल विविध प्रकार के जलीय जीव, बल्कि विविध प्रकार की जलीय वनस्पतियां एवं विभिन्न प्रकार की रंग – विरंगी पक्षियां भी पायी जाती हैं. सुरहा ताल जलीय पारिस्थितिकी एवं आर्द्र भूमि पारिस्थितिकी के लिए इतना धनी हैं कि यहां विदेशी पक्षियां अपना डेरा डाले रहती हैं. खासतौर से साइबेरियाई सारस एवं लालसर तथा अन्य रंग- विरंगी पक्षियां हजारों किमी० की यात्रा कर जाड़ा प्रारम्भ होते ही इस ताल में आ जाती हैं एवं गर्मी शुरू होते ही यहां से प्रस्थान कर जाती हैं किंतु अनियमित एवं अनियंत्रित तरीके से किए जा रहे शिकार के चलते अब ये कम संख्या में आ रही हैं.

यद्यपि कि सुरहा ताल पक्षी विहार भी है और भारत के पक्षी विहार मानचित्र पर प्रदर्शित भी है, इसके बावजूद भी इसका विकास नहीं हो पाया है और पक्षी विहार सिर्फ कहने भर को रह गया है. यद्यपि कि वर्तमान समय में सुरहा ताल एवं उसके चतुर्दिक क्षेत्र को पारिस्थितिकी दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर दिया गया है, फिर भी इसका कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है. पर्यटन की दृष्टि से भी सुरहा ताल का विकास किया जा रहा है, किंतु धरातलीय स्तर पर बहुत सफल नहीं दिखाई दे रहा है.

इस प्रकार यदि बलिया जनपद को पर्यावरण , पारिस्थितिकी एवं जैवविविधता की दृष्टि से समृद्ध एवं सुरक्षित रखना है तो सुरहा ताल को संरक्षित एवं सुरक्षित क्षेत्र तथा पर्यटन क्षेत्र घोषित कर इसका विकास करना होगा, तभी सुरहा ताल के अस्तित्व को बचाया जा सकता है. साथ ही साथ बलिया ज़िला के चिन्हित सभी आर्द्र- भूमियों को भी सुरक्षित एवं संरक्षित करना होगा, अन्यथा वनस्पति विहिन इस बलिया ज़िला को पारिस्थितिकी दृष्टि से असंतुलित होने से कोई नहीं बचा पायेगा और हमारा अस्तित्व भी खतरे में पड़ जायेगा.
 

  • बलिया से केके पाठक की रिपोर्ट 

 

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