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बताया जाता है कि वाराणसी के लक्सा थाने में तैनात उप निरीक्षक (दरोगा) मिथिलेश यादव ने बृहस्पतिवार और शुक्रवार की दरम्यानी रात करीब एक बजे उन्होंने एक दोस्त को बीएचयू भेजकर स्लिप मंगाई और आईआईएम लहुराबीर जाकर ब्लड डोनेट कर बच्ची की जान बचाई. मिथिलेश यादव ने कहा कि, मेरे खून से किसी की जिंदगी बच जाए तो जिंदगी मेरी सफल हो जाए. पिता राम चंद्र चौधरी सेना से रिटायर हैं. वे हमेशा दूसरों की मदद की सीख बचपन से हमें देते रहे. दरोगा मिथिलेश सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे हैं. आईएएस 2013-14 एक्जाम में मेंस भी निकाला था. पीसीएस की तैयारी कर रहे हैं.
फिल्म की शुरुआत वाराणसी में गंगा के तट से होती है और बताया जाता है कि कैसे करघा उद्योग कहाँ से कहाँ पहुँच गया. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और बैकग्राउंड म्यूजिक इसकी जान है. यदि आप लीक से हटकर फिल्म देखने के शौकीन हैं और भारतीय कलाओं में रुचि रखते हैं तो निश्चित रूप से आपको लगभग एक घंटे की यह फिल्म पसंद आयेगी.
