धर्म का धंधा और धंधे का धर्म

भारत एक धर्म प्रधान देश है…. धंधा धर्म को विस्तार देता है…. ग्लैमर पैदा करता है…. तो विकृति भी फ्री गिफ्ट के तौर पर परोसता है…. इसे आप चाहे तो यूं भी कह सकते हैं कि धर्म का अगर धंधा होता है… तो धंधे का भी अपना धर्म होता है….. गंगा सफाई के नाम पर अरसे से अरबों रुपये फूंके जा रहे हैं…. मगर उस गंगा साफ कैसे किया जा रहा है…. इसकी बानगी आप देख सकते हैं…..

तेरा तुझको अर्पण

यह नजारा है काशी का…. विश्वनाथ मंदिर प्रांगण से मात्र कुछ कदम की दूरी पर ….. दशाश्वमेध घाट पर….. पिछले दिनों गंगा उफनाई तो अपने मंदिर की चौखट तक पहुंच गई…. अब थिराने लगी हैं गंगा…. पानी काफी हद तक घट गया है….. मगर गंगा भारी मात्रा में गाद अर्थात सिल्ट छोड़े जा रही हैं…. कमोवेश यही हालत बनारस में वरुणा का भी है…. मानकर चलिए कि बलिया और गाजीपुर का भी नजारा भी कुछ ऐसा ही होगा….. मगर यह क्या….. हम गंगा द्वारा किनारे छोड़ी गई गंदगी को फिर वापस उसी में तेरा तुझको अर्पण की तर्ज पर उड़ेल रहे हैं….

हम इतनी जल्दी में क्यों हैं

बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि कभी विधिवत खच्चर लगा कर इस गाद या सिल्ट को यहां से हटाया जाता था…. मगर अब….. हम इतनी जल्दी में क्यों हैं? जीवनदायिनी गंगा की कोख में हमारे द्वारा जमा किया जा रहा यह सिल्ट या गाद क्या गंगा को साफ कर रहा है…. हो सकता है इस घाट को मुक्ति मिल जाए…. कहीं न कहीं तो यह जमा होगा ही…. सच्चाई तो यह है कि गंगा की सबसे बड़ी समस्या यही है…. क्या हमारी यही हरकत गंगा के अविरल बहने में बाधक नहीं है….. आखिर हम गंगा को बिहार की कोसी और बंगाल की दामोदर की तर्ज पर शोक नदी के तौर पर स्थापित करने के लिए इतने उतावले क्यों हैं?

कब तक गंगा हमारी फिक्र में दुबली होती रहेंगी

वजह साफ है…… कुछ लोगों के लिए गंगा एक दुधारू गाय जैसी है…. गंगा के घाटों पर करोड़ों का कारोबार होता है…. उनके लिए गंगा का स्वास्थ्य कोई मायने नहीं रखता…. बस घाट चकाचक होना चाहिए… उनके लिए श्रद्धालु भी एक कस्टमर से अधिक मायने नहीं रखते…. वाराणसी में 87 घाट हैं….. जिनका अपना-अपना महत्‍व है…. विद्वान कहते हैं कि काशी में गंगा स्‍नान का विशेष महत्‍व है….. यही बात बलिया में भी लागू होती है…. ददरी मेले में भारी तादाद में लोग बाग गंगा में डुबकी लगाएंगे….. इसमें करोड़ों का वारा न्यारा भी होगा….. मगर इसके लिए इतनी बेदर्दी से गंगा की सेहत के साथ हम खिलवाड़ कैसे कर सकते हैं….. अगर हम गंगा की सुध नहीं लेंगे….. तो आखिर कब तक गंगा हमारी फिक्र में दुबली होती रहेंगी….. और होंगी क्यों….

शिक्षाविद की अगुवाई में एक स्टडी रिपोर्ट

पिछले दिनों भारतीय मूल की शिक्षाविद श्रेया अय्यर की अगुवाई में एक स्टडी रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी….. ब्रिटेन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय की ओर से किए गए इस अध्ययन में कहा गया है कि भारत में धार्मिक संगठन पूरी तरह से व्यावसायिक संगठनों की तरह काम करते हैं…. अर्थशास्त्र विभाग के एक दल ने दो वर्षों तक हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख और जैन समुदाय के 568 संगठनों पर अध्ययन करने के बाद इसे प्रस्तुत किया…. जाहिर सी बात है…. गंगा को लेकर हमारा धर्म परायण कारोबारी वर्ग कितना संजीदा होगा…. समझा जा सकता है

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तीरथ महं भई पानी

कभी बाबा कबीर ने कहा था…. माया महा ठगिनि हम जानी…. तिरिगुन फांस लिए कर डोलै….. बोलै मधुरी बानी….. केसो के कमला होय बैठी….. सिव के भवन भवानी…. पंडा के मूरति हो बैठी…. तीरथ महं भई पानी….. आप अपनी जरूरत के हिसाब से इसका अर्थ लगा सकते हैं….. मगर इतना तो तय है कि पानी ही हमारे लिए तीर्थ है…… मातृस्वरूपा है…. अगर उस पानी को बचाने के लिए हम समय रहते नहीं चेते तो खामियाजा आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी….. हमारी पीढ़ी को इतिहास नदियों के सामूहिक संहारक के रूप में याद करेगा….. हम कितना भी गंगा नहा लें…. मगर दृढ़ विश्वास है कि आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी…. हम गंगा को यूं ही तेरा तुझको अर्पण की तर्ज पर लौटाते रहे तो जाहिर है गंगा भी हमारे साथ वही सलूक करेगी….

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