रामचरित मानस की प्रत्‍येक चौपाई महामंत्र के समान

कर्ण छपरा में स्‍वामी हरिहरानंद जी महराज का प्रवचन

जयप्रकाशनगर बलिया से लवकुश सिंह

मन की सरलता वाले व्‍यक्ति ही भगवान को अधिक प्रिय होते हैं. भगवान का भजन उसी व्यक्ति को फलदायी होते हैं, जिसका मन छल और कपट से रहित होता है. ऐसे व्‍यक्ति भगवन्‍न नाम संकीर्तन से असंभव से असंभव कार्यों की सिद्धि प्राप्‍त कर सकते हैं.

यह उद्गार परम पूज्‍य संत स्‍वामी हरिहरानंद जी महराज के हैं. वह कर्णछपरा के ठकुरी बाबा मठ पर अपने प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे. उन्‍होंने कहा कि वेद-पुराण अथवा रामचरितमानस में ऐसे कई प्रमाण मिलते हैं, जिसमें कहा गया है, कि कलियुग में मुक्ति पाने अथवा दैहिक-दैविक व भैतिक सुखों को सिर्फ और सिर्फ भगवन्‍ननाम संकीर्तन से ही प्राप्‍त किया जा सकता है.

स्‍वामी जी ने कहा कि वर्तमान समय में अपनी संस्‍कृति और भाषा से आमलोगों की रूची घटती जा रही है और शायद इसी दृष्टिकोण से तुलसीदासजी ने रामचरितमानस की रचना सरल भाषा में की है. रामचरितमानस की प्रत्‍येक चौपाई, महामंत्र के समान है. इसमें पिता, पुत्र, सास, ससुर, गुरु, शिष्य, मित्र,प्रजा, राजा व भाई आदि के मर्यादित जीवन जीने का शाश्वत संदेश है. उन्होंने कहा कि मानस में राजधर्म का भी विस्तृत वर्णन है. राजा वही हो सकता है, जो प्रजा को त्रिताप से मुक्त करे. राम राज्य में वैदिक, दैविक व भौतिक ताप था ही नहीं. कोई विवाद नहीं था. वहां न डॉक्टर थे और न वकील. भरत चरित्र की व्याख्या करते हुए कहा कि हमारा छोटा भाई भरत हो सकता है, अगर, हम बड़े होकर राम बने. सास कौशल्या बनेगी, तो वधू सीता बनेगी. आचरण स्वयं करना होता है, तभी व्यक्ति और समाज प्रभावित व प्रेरित होता है. भरत का चरित्र इतना निर्मल था कि स्वयं राम अहर्निश उनका स्मरण करते थे.

समाज के प्रत्‍येक व्‍यक्ति को इसका गहराई से अध्‍ययन करना चाहिए. उन्‍होंने हरे राम, हरे कृष्‍ण की सोलह अक्षरीय महामंत्र और हनुमान चलीसा पर व्‍यापक प्रकाश डालते हुए कहा कि इनके भजन व पाठ से व्‍यक्ति क्‍या नहीं हासिल कर सकता? वह दुनिया का हर भौतिक सुख व मनोवांछित कामनाओं की पूर्ति कर सकता है. उन्‍होंने कहा कि बड़े भाग्‍य से मनुष्‍य तन की प्राप्ति होती है. इसलिए ईश्‍वर के भजन के बिना मनुष्‍य का तन पूरी तरह व्‍यर्थ हो जाता है.

इससे पूर्व मंगलवार को हरिहरानंद जी महराज ने श्री हनुमान मंदिर शुकरौली में भी शास्‍वताखंड संकीर्तन को मनवांछित फल देने वाली कामधेनु से तुलना की. कहा कि कामधेनू तो सिर्फ संकल्‍पों की पूर्ति करती है, किंतु यह संकीर्तन रूपी कामधेनु न सिर्फ संकल्‍पों की पूर्ति करती है, बल्कि व्‍यक्ति के अमंगल, अनिष्‍ट और नाना प्रकार के कष्‍टों को भी दूर कर देती है.

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