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आरक्षित सीट से प्रधान के आश्रित भी जाति प्रमाण पत्र के लिए जूते घिस रहे

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बलिया। प्रदेश की गोंड, खरवार, खैरवार, घुरिया, नायक जैसी दर्जनों जातियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल किये जाने के बाद भी लगभग 1 लाख 10 हजार 114 की आबादी के वंशजों को अपनी जाति के प्रमाणिकता के लिए दर दर भटकना पड़ रहा है. शासन से स्पष्ट निर्देश के बाद भी गोंड और खरवार जाति को आये दिन तहसील प्रशासन की तुगलकी फरमान का शिकार होते देखा जा सकता है.

हालांकि विगत त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में 3.40 प्रतिशत की आबादी वाली इस जनसंख्या ने अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटो पर जीत दर कर अपने संवैधानिक अधिकारों का दबदबा भी कायम किया है. बावजूद इसके आज की तारीख में इनके ही वंशज अपनी जाति पर सरकारी मुहर की पुष्टि के लिए परेशान हैं. उनकी बेबसी का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है सरकारी फरमान की पुष्टि के लिए वर्षों पुराने प्रमाणपत्र भी बेकार साबित हो रहे हैं.

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आज्ञा सुधार अधिनियम 2002 के आधार पर केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय ने 8 जनवरी को 2003 को भारत सरकार का राजपत्र भाग-2 खंड-1 जारी कर उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर, मऊ, मिर्जापुर, आजमगढ़, सोनभद्र सहित 13 जनपदों के इन जातियों को अनुसूचित जन जाति में शामिल कर लिया था. इस बीच उक्त कानून ने एक बार फिर इन जातियों की दुखती रग पर हाथ रखते हुए इनको संवैधानिक अधिकारों से ही वंचित कर दिया.

पूर्व विधायक विजय सिंह गोंड के पुत्र विजय प्रताप ने जनहित याचिका संख्या 540 घ के द्वारा हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगाई तो सूबे की सरकार की तन्द्रा टूटी और अंततः इन जातियों की अनुसूचित जन जाति में शामिल करने एवं इनके संवैधानिक अधिकारों का फरमान जारी हुआ और जाति प्रमाण पत्र मिलने शुरू हुए, इस प्रमाण पत्र के आधार पर ही 2015 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में इन जातियों ने सुरक्षित सीटों पर जीत दर्ज कर अपना दबदबा भी कायम कर लिया. लेकिन चालू वर्ष में ऐसे कई मामले सामने आये जिसमे जनपद प्रशासन ने इन जातियों के आश्रितों को जाति प्रमाण पत्र देने में आना कानी करना शुरू कर दिया है.

हाल फिलहाल में सिंकन्दरपुर तहसील क्षेत्र के ग्रामसभा चक खान निवासिनी शकुंतला देवी जो वर्तमान में आरक्षित सीट पर प्रधान है, उन्ही के आश्रितों को जाति प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जा रहा है. इसे लेकर कई बार लेखपाल से लगायत तहसीलदार मजिस्ट्रेट तक पूर्व प्रमाणपत्रों को दिखाने के साथ साथ गुहार लगाई गई, लेकिन गणेश परिक्रमा के सिवाय कुछ हासिल नहीं हो सका है. इस संबंध में जिम्मेदार एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर पल्ला झाड़ ले रहे हैं.

इस संबंध में तहसीलदार मजिस्ट्रेट मनोज पाठक ने बताया कि प्राप्त आवेदन पत्रों की जांच के उपरांत उक्त जातियों का जाति प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है, लेकिन शर्त यह की जिलाधिकारी द्वारा निर्देशित बिंदुओं के अधीन रहते हुए आवेदक को साक्ष्य उपलब्ध कराना अनिवार्य है.

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