दिन भर में तीन बार रूप बदलती हैं खरीद की मां दुर्गा

तहसील मुख्यालय से 6 किलोमीटर दूरी पर खरीद गांव में स्थित दुर्गा मंदिर सदियों से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. मां के दरबार में हाजिरी देने वालों का पूरे वर्ष तांता लगा रहता है.

सिकंदरपुर (बलिया) से संतोष शर्मा 

तहसील मुख्यालय से 6 किलोमीटर दूरी पर खरीद गांव में स्थित दुर्गा मंदिर सदियों से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. मां के दरबार में हाजिरी देने वालों का पूरे वर्ष तांता लगा रहता है. नवरात्र के दिनों में तो यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, पूर्व राज्यपाल रमेश भंडारी सहित विभिन्न राजनीतिक दलों व सामाजिक संगठनों के बड़े नेता एवं देश के वरिष्ठ अधिकारी मां के दरबार में मत्था टेक चुके हैं. मान्यता है कि मंदिर पर जो भी सच्चे मन वह मन्नत के साथ हाजिरी देता है उसकी मनोकामना निश्चित रूप से पूरी होती है.

मंदिर का इतिहास
सदियों पूर्व खरीद का इलाका जंगल से आच्छादित था. उसी जंगल में घाघरा नदी के तट पर मेघा ऋषि का आश्रम था. पड़ोसी राजा के आक्रमण और सत्ता खोने के बाद राजा सूरथ घोड़े पर सवार होकर जंगल की तरफ चल दिए. जंगल में भटकते हुए वह मेघा ऋषि के आश्रम तक पहुंच गए. उस समय ऋषि को ध्यान में मग्न देख राजा सूरत वहीं बैठ गए, ध्यान खत्म होने के बाद ऋषि ने उनसे आने का कारण पूछा जिस पर राजा ने अपनी पूरी आपबीती उनसे कह डाली.

राजा की बातों को सुन ऋषि ने उनको देवी के उपासना की सलाह दिया. 2 वर्षों तक लगातार उपासना के बाद एक दिन देवी राजा को साक्षात दर्शन और आशीर्वाद देकर अंतर्ध्यान हो गई. बाद में देवी के आशीर्वाद से राजा सूरथ को पुनः उनका राज पाट वापस मिला. दोबारा राज मिलने के बाद राजा ने खरीद में मां दुर्गा के अष्ट धातु की मूर्ति स्थापित करवाई, जो समय के प्रवाह के साथ जमीन में दब गई थी. एक सदी पूर्व खुदाई के समय पुनः मूर्ति मिली, जिसे विधिवत स्थापित कर खूबसूरत मंदिर का निर्माण कराया गया.

मां के दरबार में सच्चे मन से जो भी भक्त हाजिरी देता है, उसकी मनोकामना निश्चित रूप से पूरी होती है. मां की मूर्ति की यह खासियत है कि सुबह से शाम तक तीन बार रूप बदलती है. तीनों रूप युवा,प्रौढ़ा व वृद्धा के होते हैं. पूरे वर्ष भक्तों का यहां आना जाना लगा रहता है. नवरात्र में रोजाना हजारों भक्त दर्शन देते हैं, जिसकी मनोकामना पूरी होती है, वह मां का होकर रह जाता है. हमेशा यहां आ कर मत्था टेकते हैं. –बृजराज उपाध्याय (पुजारी)

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