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नहीं भूलती जेपी के घर चंद्रशेखर की वह आखिरी शाम

राजनीति के इस बिगड़े स्‍वरूप के बीच चंद्रशेखर ही एक ऐसे राजनेता थे, जिनके लिए कभी जन-जन रो पड़ा. जी हां बात 10 अक्‍टूबर 2006 की है, जब चंद्रशेखर आखिरी बार जयप्रकाशनगर आए थे.
News Desk 15 April, 2017 1 minute read
CHANDRASHEKHAR

चंद्रशेखर जयंती पर विशेष

आंखों देखी वह दांस्‍ता, जिसने हर आंख को द्रवित कर दिया

लवकुश सिंह

राजनीति के इस बिगड़े स्‍वरूप के बीच चंद्रशेखर ही एक ऐसे राजनेता थे, जिनके लिए कभी जन-जन रो पड़ा. जी हां बात 10 अक्‍टूबर 2006 की है, जब चंद्रशेखर आखिरी बार जयप्रकाशनगर आए थे. युवा तुर्क को जयप्रकाशनगर की मिट्टी से कितना लगाव था, इसका उदाहरण भी वह अंतिम यात्रा ही थी. वर्ष 2006 में जेपी जयंती में शामिल होने और अपने जेपी के गांव के लोगों से आखिरी बार मिलने के लिहाज से चंद्रशेखर 10 अक्‍टूबर को दिल्‍ली से चलकर सिताबदियारा के जयप्रकाशनगर पहुंचे थे. स्‍वतंत्रता सेनानी ट्रेन जैसे ही बलिया पहुंची, वहां लोगों की भारी भीड़ पहले से ही उनकी एक झलक पाने को बेताब थी. ट्रेन रूकी और चंद्रशेखर गेट पर आए, फिर क्‍या था लोगों को देखते ही वे फफक पड़े.

कुछ देर के लिए वहां अजीब सा सन्‍नाटा पसर गया. कुछ मिनट के बाद ट्रेन आगे बढी और सुरेमनपुर स्‍टेशन पर आकर खड़ी हो गई. यहां सुरेमनपुर स्‍टेशन पर संपूर्ण द्वाबा वासी ट्रेन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. ट्रेन के यहां पहुंचते ही यहां भी वही स्थिति थी. हजारों लोगों के जन समूह ने यहां उनका स्‍वागत किया. यहां से कार में सवार होकर युवा तुर्क जयप्रकाशनगर पहुंचे. यहां जेपी ट्रस्ट पर दिन भर आराम के बाद जब शाम को चंद्रशेखर जेपी के आंगन में बैठे तो वहां फोटो खिंचवाने का दौर शुरू हो गया. बलिया और छपरा के हर इलाके से पहुंचे लोग बारी-बारी से चंद्रशेखर की कुर्सी के दोनों तरफ खड़े होकर फोटो खिंचवाते, फिर दूसरे का नंबर आता था. यह क्रम देर रात तक चलता रहा. इस बीच दिल्‍ली से उनके सांथ आए डाक्‍टर उन्‍हें ज्‍यादा देर कुर्सी पर बैठने से मना कर रहे थे, किंतु चंद्रशेखर तो आज अपनों के बीच थे.

उन्‍हें किसी भी पीड़ा का कोई एहसास नहीं हो रहा था. इसके पीछे जो कारण था, वह यह कि जब जेपी आखरी बार जयप्रकाशनगर आए थे, तब उनकी भी यही स्थिति थी. तभी उन्‍होंने चंद्रशेखर से कहा था कि हो सकता है, यह मेरी आखिरी यात्रा हो, अब इस गांव का आप ख्‍याल रखियेगा. तभी से यह स्‍थल चंद्रशेखर की कर्म स्‍थली के रूप में तब्‍दील हो गया. इसीलिए चंद्रशेखर उस दिन को किसी भी पीड़ा की परवाह किए बगैर द्वाबा के तमाम लोगों के बीच थे. अगली सुबह 11 अक्‍टूबर को जेपी जयंती थी. मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार का भी इसी स्‍थान पर आगमन होना था. अपने अस्‍वस्‍थ हाल में भी चंद्रशेखर ने नीतीश कुमार के सांथ जेपी जयंती की सभा को संबोधित किया. यह दिन भी लोगों से मिलने जुलने के क्रम में ही गुजर गया.

12 अक्‍टूबर 2006 की सुबह 10 बजे युवा तुर्क को जेपी के गांव से दिल्‍ली के लिए विदा होना था. इस क्षण का एक-एक पल हर किसी के लिए असहनीय था. चंद्रशेखर जेपी के आंगन व जेपी ट्रस्‍ट से जैसे ही बाहर निकले मुख्‍य द्वार पर आकर उनके पांव रूक गए. वे पीछे मुड़ कर जेपी निवास और संपूर्ण ट्रस्‍ट परिसर को निहारे और वहीं फफक कर इतना रोने लगे. यह दृश्‍य देखते ही वहां खड़ी हजारों लोगों की आंखें भी द्रवित हो चलीं. कुछ क्षण के लिए अजीब सा सन्‍नाटा पसर गया. युवा तुर्क धीरे-धीरे पैदल ही गेट के बाहर खड़ी अपनी गाड़ी के तरफ बढते हैं. मानों उनके पांव यहां से जाने का नाम नहीं ले रहे हों.

सड़क के दोनों तरफ हजारों लोग इस विदाई की घड़ी में उनकी एक झलक पाने को खड़े हैं. कुछ लोग उनका पांव छूकर आर्शीवाद भी ले रहे हैं. अपनी गाड़ी के पास आकर दूबारा चंद्रशेखर के पांव ठहर जाते हैं, फिर वही दृश्‍य, सभी लोगों को देख वह पुन: गाड़ी का सहरा लेकर इतना रोते हैं कि वहां मौजूद शायद ही किसी की आंखें हों, जो द्रवित नहीं हुई हों. देखते ही देखते उनकी गाड़ी आगे बढती है और पीछे रह जाता है धूल का गुब्‍बार. उनके जाने के बाद सभी की जुबां पर एक ही चर्चा होती है, शायद चंद्रशेखर अब न लौटें. हुआ भी वही. 08 जुलाई 2007 को जैसे ही यह खबर बलिया में पहुंची कि चंद्रशेखर नहीं रहे. सभी को लगा इस जिले ने अपना अभिभावक खो दिया. दरअसल चंद्रशेखर ही ऐसे व्‍यक्ति थे जिन्‍हें अपनी धरती और अपने लोगों से बेइंतहां लगाव था. यही कारण था कि लोग उनसे गांव की छोटी-छोटी बातें भी बेहिचक कह डालते थे.

 

 

Tags: बिहार मुख्यमंत्री सिताबदियारा

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