ब्रह्मपुर में श्रीमद् भागवत् कथा ज्ञान महायज्ञ

बक्सर। शान्ति धाम, श्री राम मंदिर, उधुरा, ब्रह्मपुर (बक्सर) में आयोजित श्रीमद् भागवत् कथा ज्ञान महायज्ञ में शुकवार को बहुत ही धूम धाम एवम श्रद्धा पूर्वक तुलसी विवाह का आयोजन किया गया. श्री श्री 1008 महामण्डलेश्वर श्री शिव राम दास फलहारी बाबा ने उपस्थित श्रोताओं को श्रीकृष्ण जन्म तुलसी की उत्पत्ति एवं तुलसी शालिग्राम की कथा को विस्तार से समझाते हुए कहा कि पौराणिक काल में एक  लड़की थी, जिसका नाम  वृंदा था. उसका जन्म राक्षस कुल में हुआ था. उसके बावजूद वृंदा बचपन से ही भगवान विष्णु की परम भक्त थी. वृन्दा बड़े ही प्रेम से भगवान की पूजा किया करती थी. जब वह बड़ी हुई तो उसका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया, जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था. वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी, सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.

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एक बार देवताओं और दानवों में युद्ध हुआ. जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा- स्वामी आप युद्ध पर जा रहे हैं, आप जब तक युद्ध में रहेंगे मैं पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिए अनुष्ठान करूंगी और जब तक आप वापस नहीं आ जाते मैं अपना संकल्प नहीं छोडूंगी. जलंधर तो युद्ध में चले गए और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा पर बैठ गई. उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को न जीत सके. सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु के पास गए. सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि- वृंदा मेरी परम भक्त है और मैं उसके साथ छल नहीं कर सकता, पर देवता बोले – भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है, अब आप ही हमारी मदद कर सकते हैं. भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप  बनाया और वृंदा के महल में पहुंच गए. जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा में से उठ गई और उनके चरण छू लिए. जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओं ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया. जलंधर का सिर वृंदा के महल में आ गिरा. जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पड़ा है, तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

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उन्होंने पूछा- आप कौन हैं जिसका स्पर्श मैंने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गए. पर वे कुछ न बोल सके, वृंदा सारी बात समझ गई. उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, भगवान तुरंत पत्थर के हो गए. सभी देवता हाहाकार करने लगे. लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्रार्थना करने लगीं तब वृंदा  ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गई.

उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु  ने कहा- आज से इनका नाम तुलसी है और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा, जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी के प्रसाद स्वीकार नहीं करूंगा. तभी से तुलसी की पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है. देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर रमेश गोयल, बंसल जी, भरत दास जी, राम दास जी, जगदीश दास, ओम प्रकाश दास, राजेश राय पिंटू समेत ढेर सारे लोग उपस्थित रहे.

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