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आज एक तरफ विजयी दशमी का मेला था, वहीं दूसरी ओर लोकनायक की जयंती. सुबह आठ बजे ही जयप्रकाशनगर की गलियां-जब तक सुरज चांद रहेगा, जेपी तेरा नाम रहेगा, के नारों से गुंज उठी. यहां जेपी ट्रस्ट के द्धारा ही संचालित आचार्य नरेंद्र देव बाल विद्या मंदिर के बच्चे और शिक्षक शिक्षिकाओं ने प्रभात फेरी निकाल कर जेपी को याद किया.
तो, विफलताओं पर तुष्ट हूं अपनी/ और यह विफल जीवन/ शत–शत धन्य होगा/ यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का/ कण्टकाकीर्ण मार्ग/ यह कुछ सुगम बन जावे ! यह पंक्तियां विफलता – शोध की मंजिलें शीर्षक कविता से उद्धृत हैं. उक्त कविता की रचना 9 अगस्त 1975 को चण्डीगढ़-कारावास में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने की थी. इसमें कोई संशय नहीं कि इस युग पुरुष ने शोध और प्रयोग में ही अपना जीवन गुजार दिया. आज उनकी जयंती है. आइए जानते हैं उन्हीं के शब्दों में उनके गांव के तरुणों का कण्टकाकीर्ण मार्ग किस हद तक सुगम हुआ है. प्रस्तुत है जेपी के गांव से लवकुश सिंह की स्पेशल रिपोर्ट
रामपुर चीट थाना चितबड़ागांव स्थित अपने घर से राजेश 6 अक्टूबर को दिल्ली जाने के लिए निकले थे. वे यह बता कर घर से निकले कि टॉवर लगवाने के लिए दिल्ली जा रहे हैं. 8 अक्टूबर को स्थानीय रॉयल होटल में कमरा नंबर 104 को उन्होंने बुक करवाया. 9 अक्टूबर की सुबह वेटर को बुला कर पानी का बोतल मांगा और पैसा देकर दरवाजा बंद कर लिया.
