सुनो यूपी जरा अपने ही पड़ोसी बिहार के बोल

लोग कहे क्यों यह अंतर, एक तेज तो दूजा मंथर

लवकुश सिंह

उत्तर प्रदेश (यूपी) में लोकतंत्र का एक महापर्व विधान सभा चुनाव एक बार फिर हाजिर है. आलम यह है कि कमोवेश सभी दलों के रहनुमा आमलोगों के लिए सोने का महल तक लेकर मुखातिब हैं. वहीं, लोगों को आये दिन पेश आनेे वाली समस्‍याएं भी जस की तस हर जगह खड़ी हैं. लिहाजा गांवों में मुद्दे तो उठेंगे ही. खासकर वहां, जहां के लोग हर दिन पड़ोसी राज्‍य बिहार के गांवों की तस्‍वीर देख रहे हैं. इस चुनाव में यहां और वहां में तुलना करने से भी लोग पीछे नहीं रहते. यूपी के अन्‍य विधान सभा हलकों की बात अलग है, किंतु बैरिया में एक-दूसरे राज्‍य की तुलना इसलिए भी है कि यहां के लोगों को हर दिन एक-दूसरे की सीमा में आना-जाना है.

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लोकनायक जेपी के गांव में तो यूपी-बिहार के गांव और भी पूरी तरह एक दूसरे से सटे हुए हैं. यहां क्षेत्रीय लोगों की रैयत भी एक-दूसरे की सीमा में है. किसी का घर यूपी में है, तो उसकी रैयत बिहार में है. वहीं बिहार के निवासियों के रैयत भी यूपी सीमा में है. दिलचस्‍प पहलु यह भी है कि यहां यूपी-बिहार के किसानों को अपनी रैयत के मामले में बैरिया तहसील सहित छपरा के रिविलगंज और आरा के बड़हरा प्रखंड सहित तीन स्‍थानों पर रसीद कटाने पड़ते हैं.अब हम बानगी के तौर पर यूपी-बिहार के गावों में मौजूद सुविधाओं और सरकार की जागरूकता पर नजर डालें तो लगता है, पड़ोसी बिहार, यूपी के गांवों से कुछ कह रहा है.

बिहार में प्राथमिक विद्यालयों में बच्चे, जबकि यूपी में भ्रष्टाचार

बात हम नशे के कारोबार से ही शुरू करें तो, बिहार के सभी गांव शराबबंदी कानून के लागू होने के बाद, पूरी तरह नशे से मुक्‍त हो गए. अब सड़कों पर पहले जैसी तस्‍वीर नहीं दिखती. जबकि यूपी में इस  बिन्दू पर कुछ अलग ही तस्‍वीर है. बिहार में शराबबंदी कानून ने जन-जन को इतना जागरूक किया कि इसके समर्थन में विगत सप्‍ताह 11 हजार किमी से भी बड़ी मानव श्रृंखला बनाकर, सभी ने सामूहिक रूप से नशे को ना कह दिया.

अब प्राथमिक स्‍कूलों की शिक्षा पर आयें तो बिहार में इसपर सरकार का विशेष ध्‍यान है. वैसे दोनों स्‍थानों  पर शिक्षा के नाम पर छात्रवृति, पोशाक, एमडीएम, योजना सामान्‍य रूप से लागू हैं, किंतु बिहार में इसका कड़ाई से पालन है, वहीं यूपी में सभी शैक्षिक योजनाओं में भ्रष्‍टाचार को बोलबाला. वहां के प्राथमिक विद्यालयों में बच्‍चे खचाखच भरे मिलते हैं, जबकि इधर भीड़ उसी दिन होती है, जिस दिन छात्रवृति का वितरण होता है.

हां, प्रशासनिक ढांचा एवं बोलचाल बिहार की अपेक्षा यूपी में जरूर ठीक है, किंतु ग्रामीण सड़कों के मामले में बिहार यूपी के गांवों से अब काफी आगे निकल चुका है. बिजली में भी बिहार का अब कोई जबाब नहीं. इधर जर्जर तार के चलते बिजली, हल्‍की बूंदा-बांदी भी नहीं सह पाती, जबकि उधर आंधी-तूफान भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता. इसके अलावा पानी की सुविधा हो या कटानरोधी कायों का, सबमें बिहार यूपी को पछाड़ता दिखता है.

सिताबदियारा है एक ज्वलंत उदाहरण

इसका स्‍पष्‍ट उदाहरण सिताबदियारा ही है. इस एक गांव को बचाने के लिए बिहार ने अब तक लगभग 70 करोड़ रुपये खर्च कर दिए. नतीजा यह कि सिताबदियारा में किसानों की जमीन जरूर बर्बाद हुई, किंतु अाबादी को कोई नुकसान न हुआ. वहीं इससे सटे यूपी के अठगांवा में लापरवाही के कारण 300 एकड़ जमीन तो गए ही, 350 से अधिक लोगों के मकान भी घाघरा कटान में 2013-2014 में विलीन हो गए. ये तो बस बानगी भर है, प्रदेश स्‍तर भी कुछ ऐसे ही अंतर पर आये दिन मंथन हो रहे हैं.

मांझी का जयप्रभा सेतु भी दिखाता है आइना

यूपी-बिहार के अंतर को मांझी का जयप्रभा सेतु भी आइना दिखाता है . यह सेतु एनएच-31 पर यूपी-बिहार को जोड़ता है. इस मार्ग से आवगमन करने वाले आमलोग भी यह अंतर रोज महसूस करते हैं. यह सेतु दोनों राज्‍यों की सीमा में है. उधर बिहार ने अपनी सीमा को कुछ बेहतर ढ़ग से सजा रखा है, जबकि यूपी वाला सिरा, खुद की दुर्दशा यूं ही बयां कर देता है. बिहार की ओर चमचमाती सड़कें हैं, वहीं इधर सेतु के ऊपर भी कई स्‍थानों पर सड़क टूटी हाल में हैं.

 

 

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