पूर्व प्रधानमंत्री को कचोट गया था गौरी भईया का यूं अचानक चले जाना

स्वाधीनता आंदोलनकारियों के लिए उर्वरा माटी बागी बलिया के सागरपाली की धरती पर जन्म लिए थे गौरी भईया. समाजवादी संत परम्परा के मूर्धन्य विभूति पूर्व मंत्री स्वर्गीय गौरी भईया की आज पुण्यतिथि है. गौरी भईया का सम्पूर्ण जीवन समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे गरीबी, अशिक्षा, असमानता खिलाफ लड़ते बीता. मुरली मनोहर टाउन डिग्री कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत उन्होंने की थी. गौरी भईया ने अपना पूरा जीवन समाजवादी मूल्यों और विचारधारा के प्रति सत्य निष्ठा संग निर्वहन करते व्यतीत किया. ईमानदारी उनका सबसे बड़ा आभूषण था. आज राजनीति इतनी दूषित हो गई है, लोग इसे जनसेवा नहीं व्यपार मान कर कर रहे हैं, उस दौर में हमारे पास गौरी भईया का जीवनवृत आदर्श जनप्रतिनिधि होने का सबसे बड़ा मानक है.

आज जो लोग मामूली पदों पर हैं, बेहिसाब धन दौलत और संसाधन जोड़ रहे है. वहीं 4 बार के विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री रहे गौरी भईया के निधन के समय उनके खाते में 250 रुपये होना सब कुछ बया कर जाता हैं. आपातकाल के दौरान वो 19 महीनों तक जेल में निरुद्ध रहे. वो चन्द्रशेखर जी दाई भुजा के समान थे और सही मायने में उनके वैचारिक उत्तराधिकारी भी. उनका रहन-सहन, बोली-विचार, खाना-पान सब समाजवादी था. वे फुटबाल में विषेश रुचि रखते थे और युवा पीढ़ी में अत्यंत ही लोकप्रिय रहे. आज भी उनके कई वाकया लोगो से सुनने को मिल जाते हैं.


भ्रष्टाचार उनका सबसे बड़ा दुश्मन था. उन्हें आपातकाल के दौर में

संपूर्ण क्रांति के महानायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण का अपार स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहा. लोकनायक द्वारा गठित छात्र महासंघ की बलिया इकाई के चुनिंदा प्रमुख लोगों में से आप भी एक थे. आपातकाल के ताप में आप छात्रनेता से जननेता बनकर उभरे. 1977 में हुए विधानसभा चुनाव कोपाचिट (फेफना) विधायक निर्वाचित हुए. अनवरत 1991 तक फेफना का चार दफा प्रतिनिधित्व किया. मुलायम सिंह यादव की सरकार में आप 1990-91 में लघु सिंचाई, ग्राम विकास एवं ग्रमीण अभियंत्रण विभाग के कैबिनेट मंत्री रहे. आपने राजनीति को कभी अपनी निजी सम्पदा अर्जन और विस्तार का साधन नहीं समझा. आप ने इसे जनसेवा का माध्यम माना के कार्य किया.

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आपकी ईमानदारी और कर्तव्य परायणता वर्तमान समय में सभी दलों के जनप्रतिनिधियों के लिए नजीर है. और चिरकाल तक रहेगी, क्योकि वर्तमान समय में जनप्रतिनिधियों में अपने कर्तव्य के प्रति गिरावट और विचारों में मिलावट आई है. उसमें आप जैसे होना अस्मम्भव सा है. आप कालिख की कोठरी से बेदाग निकलने वाली परम्परा के अंतिम व्यक्तियों में से रहे. आज जब मैं आपके बारे में कही पढ़ता हूं. आपके द्वारा विधानसभा में उठाये गए मुद्दों को देखता सुनता हूं तो गौरवान्वित महसूस करता हूं.

आज के जनप्रतिनिधियों चाहे जिस भी सदन के वे सदस्य हो सामान्यत दिखते नहीं. अगर दिखते हैं तो बस बेंच पीटते है. ये छल ही तो है, जनता मत के संग जो चुनकर जाए और उनकी वाजिब मुद्दों को भी न उठाएं.
आपका असमय जाना समाज के लिए अभूतपूर्व क्षति थी. जो शब्दों में बया नहीं हो सकती है. उन्हें हम भावनाओं से समझ सकते हैं. उसी पीड़ा को बयां किए थे कभी पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर जी

गौरी भैया से बड़ी आशा थी. फक्कड़ स्वभाव का यह युवक मेरी शक्ति, मेरा सहारा था. कुछ भी कर सकने में समर्थ था. निष्ठा में निराला, साहस में सबसे अधिक निडर और कार्य करने में असीम क्षमता वाला. अचानक एक दुर्घटना में चल बसा, एक सहारा टूट गया – चंद्रशेखर (पूर्व प्रधानमंत्री)