नगवां: जहां एक पीढ़ी दूसरी को सौंपती रामलीला मंचन की परंपरा

दुबहड़ : शहीद मंगल पांडेय के पैतृक गांव नगवां में 98 साल पुरानी रामलीला मंचन की परंपरा कई मायने में युवाओं के लिए पाठशाला साबित हो रही है. यहां अभिनय और कला गांव के लोगों को ही दिखाने की परंपरा है. बुजुर्ग हो चुके लोग अपने बाबा-दादा से रामलीला सीखे. अब युवा पीढ़ी उनसे अभिनय का गुर सीख रही है.

रामलीला की शुरुआत 1922 में नवजद पाठक ने भुतहिया बारी में की थी. दोपहर 12 बजे गांव के पुरुष-महिलाएं कामकाज निबटाकर कर बगीचे में पहुंचती थी. रामलीला का मंचन 3 घंटे होता था. उन्होंने गांव के युवाओं के लिए इस परंपरा की नींव रखी थी. वर्ष 1968 में नवजद पाठक का निधन 96 वर्ष की उम्र में हो गया तो गांव के बुजुर्गों ने परंपरा का निर्वहन किया.

रामलीला कमेटी की कमान आज युवाओं के हाथ में हैं. कमेटी के संरक्षक जागेश्वर मितवा,अध्यक्ष जितेन्द्र पाठक, मंत्री हरेराम पाठक और कोषाध्यक्ष अनिल पाठक बनाए गए हैं. कमेटी के सदस्य बब्बन विद्यार्थी ने बताया कि यहां कभी बाहर से मंडली नही बुलायी गयी. गांव के युवा और बुजुर्गों के मेल से रामलीला का मंचन होता है. इस परंपरा का मकसद बेहतर समाज का निर्माण है.

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