गांगा जी बिलववले बाड़ी, उहे फेरू बसाइहें…

गांगा जी बिलववले बाड़ी, उहे फेरू बसाइहें ए बाबू…. अब त गांगा जी के ही गोहरावे के बा… हमनि बेसहारा लाचार के पूछे वाला के बा…. नेता लोगिन के जतना उजियावे के रहे उजिया चुकल बा….

(एक बुजुर्ग की व्यथा)

बलिया के द्वाबा इलाके में संसार टोला तटबंध बिड़ला ने बनवाया था… जबकि दुबेछपरा रिंग बंधा गीता प्रेस ने… हां, दुबेछपरा वाले बंधे का कुछ हिस्सा किन्ही कारणों से बाकी रह गया था… जिसे हमारे कर्णधारों ने पूरा किया…. गंगा की लहरें हर बार इसी हिस्से में सेंध लगाती है… और हर बार इसी की मरम्मत होती है…

लोकमानस में गंगा साक्षात मातृस्वरूपा हैं… युगों युगों से वह अपने तटवर्तियों का पालन पोषण मातृभाव से करती आ रही हैं… अपनी संतानों की कमजोर नस को उनसे बेहतर कौन समझ सकता है…

एक बार गृहस्थी बसाने के चक्कर में हम जैसे सो कॉल्ड शहरियों की पूरी जिंदगी खप जाती हैं… जो हर दूसरे-तीसरे साल उजड़ते और बसते हैं…. पता नहीं किस मिट्टी के बने होते हैं… यह वाकई सच है कि…. सबकी रगो में लहू बहे है…. इनकी रगों में गंगा मइया… सुख दुख को खूंटी पर टांगे…

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का हो धीकल, काहें सेराइल बाड़ मरदे
का कहीं चाचा, इ जवन बटाता, एहूमे ओजन कम बा

(दुबेछपरा, बलिया ढाले पर बाढ़ पीड़ितों के बीच का संवाद)


दूध का जली पब्लिक अब अब छांछ भी, फूंक फूंक कर पीने की आदी हो गई है… महत्वपूर्ण यह नहीं है कि वजन ठीक है या नहीं… मार्के की बात यह है कि भरोसा किस हद तक डिग गया है…

बलिया के बाढ़ पीड़ितों के बीच बंट रही सामग्री कहीं बाहर से विधिवत पैक करके आ रही है… जाहिर है हुक्मरान को भी स्थानीय मठाधीशों पर भरोसा नहीं है… इस पैकेट पर कई आइटम अलग से देने की सूचना है…. जो पहले दिन बंटा ही नहीं… मीडिया ने जब इसे तूल दिया… तो अगले दिन से बंटना शुरू हुआ…

मुख्यमंत्री का आदेश था कि कोई भी बाढ़ पीड़ित खुले आसमान के नीचे नहीं रहे… मगर तादाद इतनी ज्यादा है कि सभी को छत की ओट नसीब नहीं हुई…. जो पीली पन्नी (तिरपाल) दिख रही है… सरकार द्वारा बांटी गई है, अन्य पीड़ितों ने खुद खरीद कर लगवाया है… जैसा कि पीड़ितों ने बताया…

विजय शंकर पांडेय

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