बतकही

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बतकही – कुछ और नहीं, बलिया लाइव का ब्लॉग है. यहां आप विभिन्न क्षेत्रों के लोगों की बातें सुन सकते हैं.

‘बलिया में क्रांति और दमन’ अपने आप में स्मृति ग्रन्थ है 1942 की क्रांति का

इस पुस्तक को पढ़ने पर यह ज्ञात हुआ कि बेल्थरारोड का बगावत कितनी ताकतवर रही, लोगों ने स्टेशन तक फूंक डाला, माल गाड़ी लूट ली, पोस्ट ऑफिस, उभांव थाने तक पर कब्जा कर लिया

अब जब इस जज्बे की तलाश होगी तो लोग दाढ़ी के सामने नत खड़े मिलेंगे – चंचल बीएचयू

बलिया से उठा, बलन्दी छू गया. ठेठ, खुद्दार, गंवई अक्स, खादी की सादगी में मुस्कुराता चेहरा, अब नहीं दिखेगा न सियासत में न ही समाज में, क्योंकि ऐसे लोग अब कैसे बनेंगे, जब उस विधा का ही लोप हो गया है, जो विधा चंद्रशेखर को गढ़ती रही

गुरु पूर्णिमा : कलम के सृजनात्मक इस्तेमाल का ककहरा

आज गुरु पूर्णिमा है और मुझे याद आ रहे हैं अपने गांव के मिडिल स्कूल के रामजी पंडित. याद आ रही उनकी छड़ी बरसाने की कला और लात- घूंसों से ठुकम्मस का वह अंदाज कि आज भी पुरवा चलती है तो पोर पोर परपराने लगता है.

खस्ताहाल सिकंदरपुर लालगंज मार्ग – तेरा वादे पर वादा होता गया…

छह माह से सिकन्दरपुर के पिलुई, गौराबगही मनियर के पास लगभग पचास मीटर लम्बी धंसी सड़क पर छोटे बड़े वाहनों के फंसने से लगातार जाम लग रहा है.

पर्यावरण को बचाने के लिए लॉकडाउन सरीखे उपाय रामबाण

वर्तमान समय में लॉकडाउन के प्रभाव से पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र के सभी अवयव (कारक) अपने प्राकृतिक परिवेश में स्वतंत्र रूप से विकसित होकर तथा पुष्पित एवं पल्लवित होकर पूरे निखार पर हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री को कचोट गया था गौरी भईया का यूं अचानक चले जाना

स्वाधीनता आंदोलनकारियों के लिए उर्वरा माटी बागी बलिया के सागरपाली की धरती पर जन्म लिए थे गौरी भईया. समाजवादी संत परम्परा के मूर्धन्य विभूति पूर्व मंत्री स्वर्गीय गौरी भईया की आज पुण्यतिथि है.

शराब की खुली छूट कहीं किए कराए पर पानी न फेर दे

कोरोना वायरस की जंग में लड़ने के लिए प्रभावशाली ढंग से समय रहते हमारे प्रधानमंत्री ने प्रयास शुरू कर दिया. उनकी एक अपील पर पूरे देश की जनता ने विश्वास कर लॉकडाउन को सफल बनाया.

हक के लिए बड़ी ताकतों से टकराने में तनिक गुरेज नहीं किए शारदानंद अंचल

आज 2 मई है, शारदानंद अँचल में आस्था रखने वाले लोगों के लिये यह तारीख अति महत्वपूर्ण है. पूर्वांचल के समाजवादियों के लिए यह दिन 12 अक्टूबर से कम मायने नहीं रखता, जहां एक तरफ देश ने 12 अक्टूबर को लोहिया को खोया था वहीं 2 मई को बलिया ने अपना होनहार बेटा खोया था.

बलिया कर रहा है एक और ‘मंगल पांडेय’ का शिद्दत से इंतजार

विकास कार्य के नाम पर की गयी घोषणा हकीकत के धरातल किस रूप में आयेगी यह महत्वपूर्ण बात है. केवल घोषणाओं और योजनाओं से कहीं काम चलता है.

फितरत ‘तबीयत से मिलनसार’ हो तो तबियत आड़े नहीं आती….

लेखन-साहित्य जगत में डॉ जनार्दन राय जी जैसी शख्सियतों की शिनाख्त ही बलिया की खांटी माटी से होती है… ‘गांव क माटी’ उनकी एक कृति भी है….