लोकतंत्र की पहली पाठशाला बैरिया, जाति-धर्म भूल कर एकजुट हो वीरों ने दी थी आहुति

18 अगस्त 1942 को ही हो गया था आजाद, द्वाबावासियों के लिए गौरव का दिन

संकीर्तन नगर आश्रम (बलिया) से वीरेंद्र नाथ मिश्र
बैरिया (बलिया) से वीरेंद्र नाथ मिश्र

भारत में लोकतंत्र की पहली प्रयोगशाला रहा है बैरिया. 18 अगस्त 1942 को ही यहां के क्रांतिवीरों ने अंग्रेज सिपाहियों से लड़कर 14 लोगों की शहादत के बाद आजादी हासिल कर ली थी. फिर यहां की शासन व्यवस्था यही के लोगों द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से कुछ दिन चली, बाद में यहां अंग्रेजों की दमनकारी सेना ने आकर कब्जा जमाया. इसके बाद फिर एक लंबी लड़ाई के बाद 15 अगस्त 1947 को पूरी आजादी मिली. और भारत में लोकतांत्रिक गणराज्य का स्थापना हुई.

परंपरागत ढंग से आजादी के बाद से बैरिया शहीद स्मारक पर प्रत्येक वर्ष 18 अगस्त को शहीद मेला लगता है. इस बार शहीद मेला कोविड-19 के चलते नहीं लग रहा है. परंपरागत सार्वजनिक मंच भी नहीं लगेगा, लेकिन सामाजिक दूरी बरकरार रखते हुए शहीद स्मारक पर पहुंचकर अपने अमर शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने की व्यवस्था रहेगी. जिसकी सारी तैयारी पूरी की जा चुकी है.

नगर पंचायत अध्यक्ष प्रतिनिधि शिव कुमार वर्मा मंटन ने खुद अपनी देखरेख में यहां की व्यवस्था कराई. आज सुबह बैरिया विधायक सुरेंद्र नाथ सिंह भी शहीद स्मारक पर पहुंचकर तैयारी का जायजा लिए. गौरतलब है कि बैरिया तब के द्वाबा के कण-कण में 18 अगस्त 1942 के संघर्ष की गाथा बिखरी पड़ी है. जिन्हें समेटने पर यह तथ्य सामने आता है कि उस कालखंड में महात्मा गांधी के करो या मरो आंदोलन की धमक बैरिया क्षेत्र में भी पहुंच चुकी थी. तब के समय में देश के बड़े नेता अंग्रेजों के जेलों में बंद थे या फिर भूमिगत थे. यहां के लोगों के सामने कुशल नेतृत्व का प्रकाश नहीं था.

यहां के लोगों को 19 अगस्त 1942 को बलिया में चिंत्तु पांडे के आह्वान पर यहां से कूच करने की खबर घर घर पहुंच चुकी थी. लेकिन आजादी की तड़प ने द्वाबा के लोगों को अधीर कर दिया था. ऐसे में 18 अगस्त 1942 को ही इलाके के छात्र, किसान, मजदूर, नौजवान, बूढ़े, बच्चे, साधु संन्यासी, व्यापारी सब बैरिया थाने पर उमड़ पड़े और थाने का घेराव कर दिए. उतावले युवाओं और छात्रों ने थाने पर पथराव करना शुरू कर दिया. लोगों का मकसद बैरिया थाने के बुर्ज पर लहराते यूनियन जैक को उतारकर फेंकने का था और वहां तिरंगा लहराने के लिए थाने पर कब्जा कर लेने का था.

आक्रोशित भीड़ को पथराव करते हुए थाने में घुसता देख थाने पर तैनात दरोगा व सिपाही निहत्थे लोगों पर गोलियों की बौछार शुरू कर दिए. देखते ही देखते बैरिया थाना परिसर में निर्भय कृष्ण सिंह, देश बसन कोइरी, नरसिंह राय, रामजन्म गोंड, राम प्रसाद उपाध्याय, मैनेजर सिंह, कोशिला कुमार सिंह, रामदेव कुम्हार, छोट्ठू कमकर, देवकी सुनार, धर्म देव मिश्र, भीम अहीर सहित कुल 14 लोग आजादी का सपना लिए थाने में ही शहीद हो गए.

फिर भी घेराव जारी रहा. देर रात तक रहा. रात में हल्की बरसात शुरू हुई. उसी दौरान मौका देख कर अंग्रेज सिपाही थाने के पीछे के रास्ते भाग खड़े हुए. बैरिया थाने पर दोआबा के क्रांतिवीरों का कब्जा हो गया. शीर्ष पर तिरंगा लहराने लगा. यहां से जीत हासिल कर उत्साह में द्वाबा के युवा बलिया के लिए कुछ कर गए. आजादी के बाद बैरिया थाने के सामने शहीद स्मारक बना कर शहीदों को याद करने की परंपरा बनी.

शहीद स्मारक आज भी कई अर्थों में यहां के नौजवानों को कुछ न कुछ सीख देती ही है. जैसे वर्तमान समाज में जातीयता की भावना अब अपने निम्न स्तर पर पहुंच चुकी है. लेकिन जब हम शहीद स्मारक पर नजर दौड़ाते हैं, तो जंगे आजादी मैं संघर्ष करने वाले और अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले लोगों का नाम पढ़ने पर यह बात समझ में आती है की जंगे आजादी की लड़ाई हमारे द्वाबा के हमारे पूर्वजों ने सबके साथ मिलकर लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की.

अमर शहीदों को शत शत नमन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.