News Desk October 8, 2019

Devotees offer prayers at Dashanan Temple, a Ravan Temple, in Kanpur on Dussehra.

कानपुर के बीचों-बीच स्थित कैलाश मंदिर परिसर में दशानन (रावण) का मंदिर है. कहा तो जाता है कि रावण का जन्म जिस दिन हुआ, उसी दिन उसका वध भी हुआ था. यही वजह है कि कानपुर में बना दशानन मंदिर सिर्फ विजयदशमी के दिन खुलता है और रावण दहन से पहले ही मंदिर के पट बंद हो जाते हैं. करीब 206 साल पहले संवत 1868 में तत्कालीन राजा गुरु प्रसाद ने मां छिन्नमस्तिका का मंदिर बनवाया था और रावण की करीब पांच फुट की मूर्ति उनके प्रहरी के रूप में बनवाई थी. विजयदशमी के दिन मां छिन्नमस्तिका की पूजा के बाद रावण की आरती होती है और मंदिर सरसों के दीपक और पीले फूल चढ़ाए जाते हैं.

चूंकि रावण विद्वान और पराक्रमी था. उसे महाविद्याओं का पंडित भी कहा जाता है. इसलिए उसकी विद्वता और पराक्रम के गुणों की पूजा की जाती है. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि आज के दिन जो भी व्यक्ति रावण की पूजा करता है, उसे विद्या और पराक्रम दोनों एक साथ मिल जाता है.

हिंदू धर्मग्रंथ के अनुसार, रावण के मरते समय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने लक्ष्मण से कहा था, जाओ विश्व के महान पंडित का आशीर्वाद लो. उनके चरण स्पर्श कर ज्ञान लो. वह तो भगवान राम ही थे, जिन्होंने अपने शत्रु के प्रति भी आदर दिखाया था. उसके दुर्गुणों की वजह से उसका अंत किया पर उसकी विद्वता का भी मान रखा था. उसी परंपरा का निर्वहन आज कानपुर के श्रद्धालु भी कर रहे हैं.

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण देवी आराधना भी करता था. मां की आशीष भी उस पर थी. बताया जाता है कि उसकी पूजा से प्रसन्न होकर मां छिन्नमस्तिका ने उसे वरदान दिया था कि उनकी की गई पूजा तभी सफल होगी जब भक्त रावण की भी पूजा करेंगे.

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