भक्तों के मनोरथ पूरे करती हैं उचेडा की आदिशक्ति भगवती चण्डी

कात्यायन वंशीय चौबे (चतुर्वेदी) ब्राह्मणो की परमाराध्या देवी होने से चौबे चण्डी के नाम से भी प्रसिद्ध हैं. उचेडा के देवी मंदिर में साल भर भक्त लोग आते हैं.

चिलकहर से गोपीनाथ चौबै

चिलकहर: उचेडा में स्थित मां चण्डी का मंदिर जनपद बलिया के प्रमुख शक्ति स्थलों में से एक है. यह मंदिर जनपद मुख्यालय से करीब 25 किमी पूरब और चिलकहर पंचायत मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम में स्थित है.

मान्यता है कि परम ब्रह्मात्मिका त्रिगुणातीत त्रिगुणात्मिका मां चण्डी अपने भक्तों के सभी मनोरथ पूरे करती हैं. ‘भोगश्च मोक्षस्य करस्थ दोऊ’ की मान्यता के अनुसार माता राजराजेश्वरी ललिता महात्रिपुरसुन्दरी अपने भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करती है।

वैसे तो आदि शक्ति का हर रूप और विग्रह समस्त हिन्दू मतालम्बियों, सनातन धर्म के लिए समान रूप से पूजनीय हैं, परन्तु उचेडा की भवानी मां चण्डी करचुलीय (करचोलिया) वंशीय क्षत्रिंयों की परम पूज्या और गोपालपुर के कात्यायन वंशीय चौबे (चतुर्वेदी) ब्राह्मणो की विशेष रूप से परमाराध्या देवी हैं. यह चौबे चण्डी के नाम से भी प्रसिद्ध हैं.

बताते हैं कि पराम्बा शक्ति की महिमा का सांगोपांग वर्णन पुराणों में मिलता है. आदि शक्ति माता चण्डी के उचेडा गांव में प्रादुर्भाव के संबंध मे कहा जाता है कि जनपद बलिया के पूरब मे स्थित कुसौरा के कात्यायन वंश के पंडित महानन्द चौबे कुसौरा गांव से आकर करचोलिया वंश और सेंगरवंशीय राजाओं की राज्य सीमाओं के बीच के क्षेत्र गोपालपुर में बस गये थे.

दन्त कथाओं के अनुसार विन्ध्यवासिनी के परम उपासक महानन्द चौबे पैदल विन्ध्याचल जाकर माता का विधिवत् पूजन करते थे. वृद्धावस्था के कारण उनकी प्रार्थना पर विन्ध्येश्वरी भगवती गोपालपुर से दक्षिणी छोर पर घने जंगल के पास उचेडा में विग्रह रूप में प्रगट हुई थीं.

एक बनिया (तेली) परिवार ने यहां मंदिर का निर्माण कराया था. वर्तमान समय में कुछ जागरूक लोगों के प्रयास और क्षेत्रीय जन सहयोग से इस मंदिर को भव्य रूप दिया गया.

मां चण्डी की महिमा का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां साल भर सैकड़ों और नवरात्रि में रात-दिन हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती हैं.

या चण्डी मधुकैटभादि दलनी या महिषोन्मुलनी
या धुम्रेक्षण चण्ड मुण्डमथनी या रक्त वीजासनी
शक्तिःशुम्भनिशुम्भ दैत्यदलनी या सिद्ध लक्ष्मी परा
सा देवी नवकोटि मुर्ति सहितं माम् पाहि विश्वेश्वरी

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