संभवतः जोड़ने की आवश्यकता आज कम हो गयी है

जब हिन्दी के पक्ष में हिन्दी भाषी भारतीयों से अधिक तत्परता दक्षिण के गैर हिन्दी भाषी लोगों में थी.संभवतः इसकी वजह हिन्दी की वह लोकप्रियता और लोगों को जोडने की क्षमता थी, जो उन दिनों की एक बडी आवश्यकता थी. संभवतः यह आवश्यकता आज कम हो गयी है.

हिन्दी दिवस पर विशेष

आज हिंदी दिवस को मुझे आजादी पूर्व के भारत की याद आ रही है. जब हिन्दी के पक्ष में हिन्दी भाषी भारतीयों से अधिक तत्परता दक्षिण के गैर हिन्दी भाषी लोगों में थी. संभवतः इसकी वजह हिन्दी की वह लोकप्रियता और लोगों को जोड़ने की क्षमता थी, जो उन दिनों की एक बडी आवश्यकता थी. संभवतः यह आवश्यकता आज कम हो गयी है.

उन दिनों एक विदेशी सत्ता को बेदखल करने के लिए सभी भारतीयों को एक दूसरे से जोड़ना था. आज अपने लोग हैं जिनका लक्ष्य सत्ता पाने के लिए किसी न किसी सवाल पर, चाहे वह मनुष्यता की सबसे बड़ी आवश्यकता भाषा ही क्यों न हो, को तोड़ना है. क्षेत्रीय चेतना को जगाना, सांस्कृतिक पहचान और उसकी सुरक्षा के नाम पर क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को बल देना और येन केन प्रकारेण सत्ता पाना है.

मु. तुगलक जैसे शासक के दिल्ली से दौलताबाद बार बार राज धानी बदलने से भी हिन्दी का फैलाव पश्चिमी और दक्षिणी भारत तक हुआ.अंग्रेज अंग्रेजी का वर्चस्व थोपना चाहते थे, पर उन लोगों को भी हिंदी की ताकत का अंदाजा हो गया और फोर्टविलियम कालेज तथा कुछ दूसरी संस्थाओं की स्थापना करके हिन्दी को आगे बढ़ाने का निर्णय लेना पड़ा. भले इसकी मंशा किसी साजिश का हिस्सा हो.

बंगाल के श्रीरामपुर कालेज में स्थापित लार्ड कैरी की मूर्ति की याद आ रही है जिनके प्रयास से छापाखाना के लिए हिंदी का ‘लेटर’ पहली बार ढाला गया था. ये वो लोग थे जो विदेशी थे, जिनकी नीयत भले अच्छी न रही हो, पर हिन्दी को लाभ मिला. आज हम ऐसे लोगों से घिरे हैं जो देशी हैं, हमारे हैं, इनकी नीयत अच्छी है, पर हिन्दी की दुर्गति हो रही है.

हमारे देश की सारी भाषायें राष्ट्र की हैं.सभी हमारी राष्ट्र भाषायें हैं. अन्य भाषायें माला के फूल की तरह हैं तो हिन्दी उसके धागे की तरह है. हमारी अन्य भाषायें राष्ट्र के शरीर के विभिन्न अंगों की तरह हैं तो हिन्दी उनकी श्वांस की तरह है, जो जीने की आवश्यक शर्त है.

भाषा के नाम पर हिंदी दिवस शायद अपनी तरह का एक मात्र आयोजन है, जो मुझे लगता है, भला कम करता है, दूसरी भाषाओं के मन में ईर्ष्या अधिक पैदा करता है. यह हिंदी को श्वास धर्मी नहीं आयोजन धर्मी अधिक बनाता है.

जिस हिंदी से विदेशी आक्रान्ता हिन्दुस्तान को परास्त करके भी हार गए थे, आज हिन्दी दिवस को उसके लिए हम किसी से गिड़गिड़ाएं नहीं, चिरौरी न करें. कर सकें तो उसे रचनात्मक ऊर्जा दें और उसे अपने दम पर आगे बढ़ने दें. राजनीतिक करने वाले बन्द करें उसको लेकर राजनीति.वह किसी की मोहताज नहीं. वह अपनी समस्याओं का सौहार्द्र पूर्ण समाधान अवश्य निकाल लेगी.

यशवंत सिंह

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